'पत्तियां सूखतीं तो घर खर्च चलता था', रांची के लोगों को आज भी याद है नामकुम की चाय
नामकुम कभी झारखंड का प्रमुख चाय उत्पादक क्षेत्र था, जहाँ ब्रिटिश शासन के दौरान 1200 एकड़ में उच्च गुणवत्ता वाली चाय की खेती होती थी। स्थानीय लोग आज भी ...और पढ़ें

नामकुम ब्रिटिश काल में झारखंड का प्रमुख चाय उत्पादक था।
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नामकुम ब्रिटिश काल में झारखंड का प्रमुख चाय उत्पादक था।
1200 एकड़ में उच्च गुणवत्ता वाली चाय की खेती होती थी।
जागरण संवाददाता, रांची। आज जहां नामकुम में चाय बागान और बड़गांवा क्षेत्र में बस्तियां और खेत नजर आती हैं, वही क्षेत्र एक समय झारखंड के प्रमुख चाय उत्पादक क्षेत्रों में गिना जाता था। स्थानीय इतिहास और पुराने भू-अभिलेख बताते हैं कि ब्रिटिश शासन के दौरान नामकुम, बड़गांवा, रामपुर और प्लांडू तक फैले करीब 1200 एकड़ क्षेत्र में उच्च गुणवत्ता वाली चाय की खेती होती थी।
यहां तैयार होने वाली चाय रामपुर स्थित असम फ्रंटियर टी कंपनी लिमिटेड के कारखाने में प्रोसेस और पैक की जाती थी, जिसके बाद इसे देश के विभिन्न हिस्सों के साथ विदेशों तक भेजा जाता था। स्थानीय लोगों के अनुसार उस दौर में चाय के बागानों में बड़ी संख्या में ग्रामीणों को रोजगार मिलता था।
महिलाएं और पुरुष चाय की पत्तियां तोड़ते थे, जिन्हें बैलगाड़ी और बाद में ट्रैक्टर से रामपुर स्थित कारखाने तक पहुंचाया जाता था। कई ग्रामीण अपने उपयोग के लिए भी चाय की पत्तियां सुखाकर स्थानीय हाट-बाजार में बेचते थे, जिससे उनकी अतिरिक्त आमदनी होती थी।
जमींदार एवं समाजसेवी लाल काली शरण नाथ शाहदेव बताते हैं कि नामकुम से प्लांडू तक फैले चाय बागान पूरे क्षेत्र की पहचान थे। उनके अनुसार बड़गांवा मौजा के खेवट संख्या-2 में 481 एकड़ भूमि दर्ज थी, जिसमें 207.79 एकड़ क्षेत्र केवल चाय की खेती के लिए दर्ज था। वर्ष 1932 से पहले यह भूमि असम फ्रंटियर टी कंपनी लिमिटेड को स्थायी बंदोबस्ती पर दी गई थी।
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स्थानीय बुजुर्गों की यादों में आज भी उस दौर की तस्वीरें ताजा हैं। 90 वर्षीय भगवती देवी बताती हैं कि यहां की चाय अपनी गुणवत्ता के लिए मशहूर थी। आसपास के ग्रामीण चाय की पत्तियां सुखाकर बाजारों में बेचते थे और इसी से परिवार का खर्च चलता था।
दुर्गा शंकर झा बताते हैं कि चाय के पौधों के साथ बड़ी संख्या में 'कोंगा' के पेड़ भी लगाए गए थे, जिनके रेशों का उपयोग पैराशूट से जुड़े उपकरण बनाने में होता था। वहीं जामुन के पेड़ों की भी भरमार थी। बड़गांवा निवासी किशोर वर्मा और मनोज कुमार सिंह बताते हैं कि उनके बुजुर्ग अक्सर कहते थे कि नामकुम की चाय की मांग देश ही नहीं, विदेशों में भी थी।
हालांकि समय के साथ चाय बागान समाप्त हो गए, लेकिन रामपुर स्थित पुराने कारखाने के कुछ ढांचे और मशीनें आज भी उस गौरवशाली इतिहास की गवाही देते हैं।
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