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    '100% नेचुरल' या 'जीरो मैदा' के नाम पर गुमराह तो नहीं हो रहे आप? FSSAI के रडार पर आए कई बड़े ब्रांड्स

    Updated: Tue, 04 Aug 2026 12:52 PM (IST)

    जब हम बाजार से कोई सामान खरीदते हैं, तो पैकेट पर लिखे "100% नेचुरल", "ऑर्गेनिक", "हाई प्रोटीन" या "जीरो मैदा" जैसे शब्दों को देखकर अक्सर उसे तुरंत अपन ...और पढ़ें

    क्या आपका 'हेल्दी' खाना सच में हेल्दी है? (Image Source: AI-Generated)

    क्या आपका 'हेल्दी' खाना सच में हेल्दी है? (Image Source: AI-Generated)

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आप भी बाजार में खरीदारी करते वक्त 'जीरो मैदा', '100% नेचुरल' या 'हाई प्रोटीन' का टैग देखकर सामान अपनी कार्ट में डाल लेते हैं?

    अगर हां, तो आपको थोड़ा सावधान होने की जरूरत है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने हाल ही में कई कंपनियों को नोटिस जारी कर उनके इन बड़े और लुभावने दावों पर कड़े सवाल पूछे हैं।

    पैकेटबंद खाने के दावों पर FSSAI सख्त

    भारत का हेल्थ और वेलनेस फूड मार्केट आज के समय में बहुत तेजी से बढ़ रहा है। हर कंपनी सेहत के प्रति जागरूक ग्राहकों को अपनी ओर खींचने की होड़ में है।

    इसी को देखते हुए, FSSAI ने पिछले एक महीने में ब्रेड, चॉकलेट, कुकिंग ऑयल, नूडल्स, जूस, पैकेटबंद पानी, सप्लीमेंट्स और कैफीन वाले ड्रिंक्स बनाने वाले कई ब्रांड्स को नोटिस भेजे हैं। जांच का मुख्य विषय यह है कि पैकेट के सामने जो 'ऑर्गेनिक' या 'इम्युनिटी बढ़ाने' जैसे वादे किए गए हैं, क्या प्रोडक्ट के अंदर की सामग्री सच में वैसी है?

    हालांकि, ये अभी सिर्फ नोटिस हैं और कोई अंतिम फैसला नहीं आया है। कंपनियों के जवाब और आगे की नियामक जांच के बाद ही स्थिति साफ होगी।

    FSSAI के रडार पर हैं ये बड़े दावे

    एफएसएसएआई उन टैग्स और दावों की पड़ताल कर रहा है जो अक्सर ग्राहकों को गुमराह करने का काम करते हैं:

    • ऑर्गेनिक: क्या बिना किसी आधिकारिक सर्टिफिकेट या लोगो के स्प्रेड्स और सप्लीमेंट्स को 'ऑर्गेनिक' बताया जा रहा है?
    • नेचुरल और फ्रेश: नूडल्स और बन जैसे पैकेटबंद सामानों में इस्तेमाल सामग्री और उन्हें बनाने का तरीका क्या सच में उनके 'नेचुरल' होने का सबूत देता है?
    • बीमारियां दूर करने के दावे: तेल, पानी और टोफू पर 'हार्ट हेल्दी', 'डिटॉक्स' या 'एंटी-कैंसर' जैसे बड़े दावे बिना किसी ठोस आधार के किए जा रहे हैं।
    • जीरो मैदा और फलों की ब्रांडिंग: ब्रेड, वेफर्स या चॉकलेट पर फलों की तस्वीर लगाना या 'जीरो मैदा' लिखना, क्या सच में प्रोडक्ट की असली बनावट को दर्शाता है?
    • नेचुरल शुगर: क्या फ्रूट ड्रिंक्स में अलग से चीनी या फ्रुक्टोज मिलाने के बावजूद उन्हें 'प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली चीनी' वाला बताया जा रहा है?
    • FSSAI अप्रूव्ड: न्यूट्रास्युटिकल प्रोडक्ट्स पर यह लिखना ग्राहकों में यह गलतफहमी पैदा कर सकता है कि खुद रेगुलेटर इस प्रोडक्ट का प्रचार कर रहा है।
    • एनर्जी और फोकस: कैफीन वाले एनर्जी ड्रिंक्स के दावों और उनके प्रोडक्ट विवरण पर भी सवाल उठाए गए हैं।

    'हेल्थ हेलो' का मनोवैज्ञानिक हथकंडा अपना रहीं कंपनियां

    दरअसल, कंपनियां एक मनोवैज्ञानिक हथकंडा अपनाती हैं जिसे "हेल्थ हेलो" इफेक्ट कहा जाता है। पैकेट पर अगर कोई एक अच्छा और पॉजिटिव शब्द लिखा हो, जैसे- नेचुरल, तो ग्राहक उस पूरे प्रोडक्ट को हेल्दी मान बैठते हैं और उसकी कमियों की जांच नहीं करते।

    इसलिए ध्यान रहे, पैकेट का फ्रंट साइड सिर्फ एक विज्ञापन है। प्रोडक्ट को सही से परखने वाली जानकारी (जैसे फैट, शुगर, सामग्री और कार्बोहाइड्रेट) हमेशा पीछे दी जाती है। एक 'नेचुरल' या 'शुगर-फ्री' दिखने वाले प्रोडक्ट में भी बहुत ज्यादा मात्रा में नमक या चीनी छिपी हो सकती है।

    इसके अलावा, कंपनियां 'सर्विंग साइज' के नाम पर भी बड़ा खेल करती हैं। पैकेट पर न्यूट्रिशन का जो मामूली-सा आंकड़ा दिखता है, वह अक्सर हमारे द्वारा आमतौर पर खाए जाने वाले हिस्से से बहुत छोटा होता है।

    कुल मिलाकर, इस स्थिति के लिए सिर्फ कंपनियां ही जिम्मेदार नहीं हैं। ग्राहक खुद भी अच्छी सेहत के लिए एक ऐसा शॉर्टकट ढूंढते हैं जिसे आसानी से खरीदा जा सके। ऐसे में, अगर पैकेट के आगे कोई बड़ा दावा लिखा है और पीछे लेबल पर उसे ठीक से समझाया नहीं गया है, तो यह खतरे की सबसे बड़ी घंटी है।

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