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    काशी की तंग गलियों में छिपा है स्वाद का खजाना! हैरान कर देगा इन जायकों का हजारों साल पुराना इतिहास

    Updated: Sat, 18 Apr 2026 08:00 PM (IST)

    बनारस (वाराणसी) सिर्फ अपने गंगा घाटों के लिए ही नहीं, बल्कि समृद्ध और प्राचीन खानपान विरासत के लिए भी मशहूर है। ...और पढ़ें

    काशी की गलियों में छिपा है हजारों साल पुराना स्वाद का खजाना (Picture Credit- AI Generated)

    काशी की गलियों में छिपा है हजारों साल पुराना स्वाद का खजाना (Picture Credit- AI Generated)

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बात जब भी बनारस की होती है, तो सबसे पहले हमारी आंखों के सामने गंगा के घाट, मंदिरों की घंटियों की गूंज और आध्यात्म की तस्वीर उभर आती है। एक पुरानी कहावत है-"खाने के लिए सूरत और मोक्ष के लिए बनारस," लेकिन अगर आप खाने के शौकीन हैं, तो यह शहर आपको जीते जी स्वर्ग का अनुभव करा सकता है।

    बनारस की तंग गलियों में सिर्फ भगवान का ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बेहतरीन जायकों का भी वास है। आइए एक स्वादिष्ट सफर पर चलते हैं और जानते हैं बनारस के इस ऐतिहासिक खानपान की कहानी।

    कचौड़ी और आलू की सब्जी

    बनारस की सुबह इसके बिना अधूरी है। यहां की कचौड़ी आम खस्ता कचौड़ी जैसी नहीं, बल्कि मुलायम 'पूरी' की तरह होती है, जिसे मसालेदार आलू-चने की सब्जी के साथ परोसा जाता है। संस्कृत ग्रंथों में इसे 'पुरिका' कहा गया है, जो 2000 सालों से भी ज्यादा समय से भारतीय खानपान का हिस्सा है।

    लौंगलता और बनारसी मिठास

    तीखे के बाद मीठा बनारस की परंपरा है। सर्दियों में गाजर-लौकी के हलवे के अलावा 'लौंगलता' यहां की जान है। मावा और मेवे से भरी इस मिठाई को देसी घी में तलकर गाढ़ी चाशनी में डुबोया जाता है। साथ ही यहां दूध से बनी और भी कई मिठाइयां मिलती हैं।

    सर्दियों का जादुई 'मलइयो'

    यह सर्दियों का सबसे खास तोहफा है। ओस की बूंदों और दूध को मथकर तैयार की जाने वाली यह क्रीमी मिठाई मुंह में जाते ही हवा की तरह घुल जाती है। केसर-इलायची की महक और मेवों के साथ इसे मिट्टी के कुल्हड़ में परोसा जाता है।

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    चटपटी टमाटर चाट

    शुद्ध देसी घी में टमाटर, उबले आलू, अदरक, काले नमक और भुने जीरे को पकाकर इसे तैयार किया जाता है। गरमागरम कुल्हड़ में निकालकर, ऊपर से जीरे की चाशनी, धनिया और कुरकुरे नमक पारे के साथ इसका खट्टा-मीठा स्वाद शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।

    अंत में 'बनारसी पान'

    इतना तला-भुना और मीठा खाने के बाद पाचन के लिए बनारसी पान सबसे जरूरी है। मगही पत्ते में कश्मीर का जाफरान, कलकत्ता की सुपारी, केरल की लौंग-इलायची और यूपी-बिहार का कत्था पड़ता है। बता दें कि पान-सुपारी का यह चलन लगभग 3000 साल पहले दक्षिण-पूर्व एशिया से भारत आया था।

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