दाढ़ी में छिपाकर भारत लाए थे 'कॉफी': कभी 'शैतानी फल' मानकर आग में फेंकी गई, बेहद दिलचस्प है इसका इतिहास
सच कहें तो आज की इस भागती-दौड़ती जिंदगी में कॉफी सिर्फ एक बेवेरेज नहीं, बल्कि हमारा 'पावर बैंक' है। ...और पढ़ें

कॉफी का अनोखा इतिहास: शैतानी फल से भारत के 'फेवरेट ड्रिंक' बनने का सफर (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। एक ऐसा जादू, जो पलक झपकते ही सारी सुस्ती को छूमंतर कर देता है और दिमाग की बत्ती जला देता है। बिल्कुल सही समझे आप, बात हो रही है हमारी और आपकी चहेती 'कॉफी' की।
आज की इस रफ्तार भरी जिंदगी में यह सिर्फ एक ड्रिंक नहीं, बल्कि हम सबका 'सर्वाइवल किट' बन चुकी है। दुनिया भर को जगाने और एक धागे में पिरोने वाला यह 'ग्लोबल कल्चर' आखिर शुरू कहां से हुआ?
जिस कॉफी के बिना हमारी सुबह का सूरज नहीं उगता, उसका अपना इतिहास क्या है? आइए, इस आर्टिकल में कॉफी के दिलचस्प सफरनामे को जानते हैं।

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बकरियों की वो उछल-कूद जिसने दुनिया को दी कॉफी
अगर हम कॉफी के जन्मस्थान की बात करें, तो इथियोपिया का नाम सबसे पहले आता है। 800 ईस्वी के आसपास की एक मशहूर किंवदंती है। काल्डी नाम का एक स्थानीय चरवाहा अपनी बकरियां चरा रहा था। उसने देखा कि एक खास पेड़ की लाल बेरीज खाने के बाद उसकी बकरियां अजीब-सी मस्ती में आ गईं और बेहद फुर्तीली हो गईं। उत्सुकता में आकर काल्डी ने भी उन दानों को खाया और खुद में गजब की ऊर्जा पाई।
जब यह बात स्थानीय बौद्ध मठ के संतों तक पहुंची, तो उन्होंने इसे 'शैतानी फल' मानकर आग के हवाले कर दिया, लेकिन आग में भुनने के बाद उन दानों से ऐसी जादुई महक उठी कि संतों को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने तुरंत दानों को आग से निकाला और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए गर्म पानी में मिला दिया।
बस, यहीं से दुनिया की पहली कॉफी का जन्म हुआ। इस ड्रिंक ने संतों को रात भर प्रार्थना में जगाए रखने में मदद की। हालांकि, कुछ लोग यह भी मानते हैं कि कॉफी की असली शुरुआत इथियोपिया और उत्तरी केन्या के खानाबदोश 'ओरोमो/गल्ला' कबीलों ने की थी।
यमन में यूं शुरू हुई कॉफी की खेती
यमन के लोगों का भी कॉफी की खोज में एक बड़ा योगदान माना जाता है। एक किस्सा है कि यमन के एक सूफी संत इथियोपिया की यात्रा पर थे। उन्होंने देखा कि एक पौधे का फल खाकर कुछ पक्षी बहुत चहक रहे हैं। थकान मिटाने के लिए संत ने भी वह फल खाया और उन्हें तुरंत ताजगी महसूस हुई। बाद में, इथियोपिया से ये बीज यमन लाए गए और वहां के व्यापारियों ने अपने देश में इसकी खेती शुरू कर दी।
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कभी 'अरेबिया की वाइन' के नाम से मशहूर थी कॉफी
15वीं सदी में लाल सागर पार कर कॉफी यमन में फैली और 16वीं सदी तक यह मिस्र, सीरिया, तुर्किए और फारस के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई। लोग इसका इस्तेमाल प्रार्थनाओं में ध्यान केंद्रित करने के लिए करते थे।
1475 में कॉन्स्टेंटिनोपल में दुनिया का पहला कॉफी हाउस खुला। उस जमाने में आज जैसी तकनीक नहीं थी, इसलिए ये कॉफी हाउस महज ड्रिंक पीने का अड्डा नहीं थे। यहां लोग शतरंज खेलते, संगीत सुनते और दुनिया भर की खबरें शेयर करते थे। इन जगहों को ज्ञान का केंद्र मानकर "स्कूल ऑफ द वाइज" कहा जाने लगा। मक्का आने वाले तीर्थयात्रियों के जरिए यह "अरेबिया की वाइन" के रूप में दुनिया भर में मशहूर होने लगी।
यूरोप के रईसों का नया शौक
17वीं शताब्दी आते-आते इस विदेशी ड्रिंक ने इटली के रास्ते यूरोप में कदम रखा। 1645 में वेनिस में यूरोप का पहला कॉफी हाउस खुला और यह रईसों की शान बन गई।
डच और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनियों ने इसे इंग्लैंड पहुंचाया, जहां 1651 में ऑक्सफोर्ड में और फिर लंदन में कॉफी हाउस खुले। ये जगहें सिर्फ पुरुषों के लिए होती थीं, जहां वे व्यापार और समाचारों पर चर्चा करते थे। पेरिस में इसे 1669 में राजा लुई XIV के दरबार के राजदूत सुलेमान आगा ने एक 'जादुई ड्रिंक' के तौर पर पेश किया। 1671 में पास्कल नामक शख्स ने एक कॉफी बूथ खोला और लोग "पेटिट नॉयर" की तलाश में वहां जुटने लगे। हालांकि, यूरोप की कड़ाके की ठंड कॉफी के पौधों को रास नहीं आई।

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कड़ी पाबंदी के बावजूद भारत कैसे पहुंचे कॉफी के बीज?
1600 के दशक तक कॉफी के बीजों पर यमन का सख्त पहरा था ताकि कोई इन्हें कहीं और न उगा सके, लेकिन एक मुस्लिम तीर्थयात्री, बाबा बुदान ने 1600 ईस्वी में इतिहास बदल दिया। वह मक्का से कुछ कॉफी बीन्स छिपाकर भारत ले आए। ब्रिटिश उपनिवेशवादियों की मदद से, यहीं से अफ्रीका और अरब के बाहर कॉफी की पहली कमर्शियल खेती शुरू हुई।
दूसरी ओर, 1600 के दशक के अंत में डच व्यापारियों ने इसे इंडोनेशिया तक पहुंचाया और फ्रांसीसियों ने 1800 के दशक में वियतनाम, थाईलैंड और कंबोडिया में इसके बागान लगाए। डच लोगों को इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर इसे उगाने में शानदार सफलता मिली।
अमेरिका में कॉफी ने कैसे ली चाय की जगह?
1607 में कैप्टन जॉन स्मिथ जेम्सटाउन में कॉफी लेकर आए, लेकिन तब लोग चाय को ही ज्यादा पसंद करते थे। 1670 में बोस्टन में पहली बार डोरोथी जोन्स को इसे बेचने का लाइसेंस मिला। अमेरिका में कॉफी तब असल में सुपरहिट हुई जब ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विरोध जताते हुए लोगों ने सारी चाय समंदर में फेंक दी। इसके बाद चाय पीना देशभक्ति के खिलाफ मान लिया गया और कॉफी सबकी पहली पसंद बन गई।
लैटिन और मध्य अमेरिका का गर्म और नमी वाला ट्रॉपिकल मौसम कॉफी के लिए वरदान साबित हुआ। 1726 में वहां पहली पैदावार हुई। 18वीं सदी के मध्य तक वहां बड़े पैमाने पर जंगल साफ करके कॉफी के बागान लगाए गए। आज भी, ब्राजील पूरी दुनिया में कॉफी का सबसे बड़ा उत्पादक देश बना हुआ है।