मुगलों की एक फरमाइश से शुरू हुआ 'रतलामी सेव' का सफर, पढ़ें 200 साल पुरानी इस नमकीन की कहानी
पोहा हो, दाल-चावल, भेलपूरी या फिर पापड़ी चाट- रतलामी सेव हर डिश का स्वाद दोगुना कर देती है। ...और पढ़ें

मुगलों के लिए बनाई गई थी पहली 'रतलामी सेव' (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आपने कभी सोचा है कि पोहा, भेलपूरी या चाट का स्वाद बढ़ाने वाली कुरकुरी 'रतलामी सेव' आखिर आई कहां से? भारत से लेकर अमेरिका, ब्रिटेन, चीन और सिंगापुर तक में अपनी पहचान बना चुकी यह नमकीन सिर्फ एक स्नैक नहीं, बल्कि एक बेहद दिलचस्प इतिहास का हिस्सा है।
बता दें, 200 साल से भी ज्यादा पुरानी यह डिश दरअसल एक अचानक घटी घटना का नतीजा है। आइए जानते हैं कि इस जीआई टैग वाली डिश का सफर कैसे शुरू हुआ था।

(Image Source: AI-Generated)
कैसे पड़ा 'रतलाम' का नाम?
इस नमकीन की कहानी मध्य प्रदेश के मालवा इलाके में बसे रतलाम शहर से जुड़ी है। साल 1652 में जोधपुर के राजा उदय सिंह के परपोते, राजा रतन सिंह राठौर ने इस रियासत को बसाया था। शुरुआत में इसका नाम 'रत्नपुरी' रखा गया था। बाद में राजा रतन सिंह और उनके पहले बेटे राम सिंह के नामों को मिलाकर इसे 'रतरम' कहा गया, जो धीरे-धीरे आम बोलचाल में बदलकर 'रतलाम' हो गया।
मुगलों को लगी भूख और बन गई 'रतलामी सेव'
रतलामी सेव की कहानी 19वीं सदी के अंत से जुड़ी है। एक बार मुगल बादशाह मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र के दौरे पर थे। तभी उन्होंने अचानक एक जगह अपना पड़ाव डाल दिया। वहां उन्हें अचानक मीठी 'सेवईं' खाने की तीव्र इच्छा हुई, जो आमतौर पर ईद के मौके पर गेहूं से बनाई जाती है, लेकिन उस समय शाही कैंप में गेहूं मौजूद नहीं था।
अपनी इस ख्वाहिश को पूरा करने के लिए मुगलों ने स्थानीय 'भील' जनजाति के लोगों से कहा कि वे वहां आसानी से उपलब्ध चने के आटे से उनके लिए सेवईं बनाएं। भील जनजाति ने मुगलों के लिए बेसन की जो सेवईं तैयार की, वही आज की मशहूर 'रतलामी सेव' की पहली रेसिपी थी। चूंकि इसे सबसे पहले भील जनजाति ने बनाया था, इसलिए शुरुआत में इसे 'भीलड़ी सेव' का नाम दिया गया था।
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कैसे शुरू हुआ इसका व्यापार?
लगभग 200 सालों तक यह सेव मुख्य रूप से लोगों के घरों में ही बनती रही, लेकिन 1900 के दशक में इसका व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो गया। रतलाम के साखलेचा परिवार ने इसे कमर्शियल तौर पर बेचने की पहल की। 1900 के दशक की शुरुआत में स्वर्गीय केसरमल साखलेचा और उनके बेटे स्वर्गीय शांतिलाल साखलेचा ने इसकी पहली दुकान खोली थी। आज मध्य प्रदेश के इंदौर और गुजरात की कई बड़ी स्नैक कंपनियां भी इसका उत्पादन कर रही हैं।
क्या है रतलामी सेव की खासियत?
रतलामी सेव को 2014-15 में जीआई टैग से सम्मानित किया गया था। यह टैग 'रतलाम सेव एवं नमकीन मंडल' के आवेदन पर मिला था। असल में, इस सेव की सबसे बड़ी खासियत रतलाम की मिट्टी, जलवायु और यहां का पानी है, जो इसे इतना कुरकुरा और जायकेदार बनाते हैं।
इसे मुख्य रूप से चने की दाल के आटे, लौंग और काली मिर्च से बनाया जाता है। आज के समय में यह लहसुन, पुदीना, पालक और यहां तक कि पाइनएप्पल जैसे कई अलग-अलग स्वादों में भी मिलती है।
एक नमकीन और कई दावेदार
यह नमकीन भील जनजाति के इतिहास का एक बेहद अहम हिस्सा है, लेकिन आज के समय में इस डिश को लेकर एक संघर्ष भी चल रहा है। कई बड़ी नमकीन कंपनियां इसके निर्माण पर अपना दावा ठोक रही हैं। इस लंबी कानूनी लड़ाई की वजह से भील समुदाय के उन लोगों पर बेदखली का खतरा मंडरा रहा है, जिनके पूर्वजों ने असल में इस विश्व प्रसिद्ध स्नैक का आविष्कार किया था।