जब पुर्तगालियों के 'पनीर' से बंगालियों ने सीखा छेना बनाना, फिर हुई रसगुल्ले की क्रांति! एक हुनर ने ऐसे बदला स्वाद
हर तीज-त्योहारों पर छेना और रसगुल्ला बाजारों में मिलना आम है पर क्या आप जानते हैं आखिर कैसे बंगाल में छेना और फिर रसगुल्ला बना? ...और पढ़ें

बंगाल के रसगुल्ले का 1868 से जुड़ा है इतिहास (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। एक समय था जब वैदिक परंपरा ज्यादा चलन में थी और फटा हुआ दूध शुभ नहीं माना जाता था, लेकिन बंगाल इसमें अपवाद साबित हुआ और उसने इस परंपरा को बदला। तभी तो छेना और रसगुल्ला भारतीय मिठाइयों का हिस्सा बना।
आज हम इन्हीं मिठाइयों की राजधानी कहे जाने वाले बंगाल की बात करेंगे और जानेंगे कि आखिर कैसे बंगालियों ने छेना बनाना सीखा और रसगुल्ले की क्रांति हुई।
छेना कैसे बना बंगाल का हिस्सा?
कहा जाता है कि फटे दूध से छेना बनाने की यह कला बंगालियों ने पुर्तगालियों से सीखी थी। 16 वीं शताब्दी में जब पुर्तगालियों ने सेरमपुर में अपना अड्डा बनाया, उस समय बंगालियों से ही उनका संपर्क बढ़ा था। पुर्तगालियों के खानपान में पनीर और चीज खासतौर से शामिल थी, इसी को देखकर बंगाल के लोगों ने दूध में नींबू के रस जैसा एसिड डालकर छेना बनाना सीखा और रसगुल्ले का आविष्कार हुआ।
बंगाल के रसगुल्ले का 1868 से जुड़ा इतिहास
साल 1868 में नबिन चंद्र दास ने सबसे पहले रसगुल्ला बनाया था। तब से ही उनका नाम रसगुल्ले का कोलंबस हो गया। इसके बाद दास की बेटी केसी दास ने रसगुल्ले बनाने की इस परंपरा को आगे जारी रखा।
ओडिशा का भी दावा
ओडिशा राज्य भी यह तर्क देता रहा है कि रसगुल्ले की उत्पत्ति का संबंध भगवान जगन्नाथ से जुड़ी है। दरअसल, जगन्नाथ पुरी में 12 वीं सदी से ही भगवान को जो भोग लगाया जाता है उसमें छेना भी शामिल होता है। ओडिशा के लोगों का तो यह तक मानना है कि लार्ड कर्जन ने जब बंगाल का विभाजन नहीं किया था तब बंगाल के सूबे में बिहार के साथ ओडिशा भी उसका हिस्सा हुआ करता था। उस समय निर्धन ओडिशा के लोग रईस बंगालियों के घरों में रसोइए के रूप में काम करते थे। ऐसे में इन्हीं रसोई से रसगुल्ले का जन्म हुआ।
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दोनों रसगुल्लों को मिला जीआई टैग
बंगाल और ओडिशा दोनों ही रसगुल्ले पर अपना-अपना दावा पेश करते हैं पर जानने वाली बात यह है कि दोनों राज्यों के रसगुल्ले जीआई टैग हासिल कर चुके हैं। साल 2017 नवंबर महीने में बंगाल के रसगुल्ले को सबसे पहले 'बंग्लार रसोगुल्ला' नाम से जीआई टैग मिला था। उसके बाद जुलाई 2019 में ओडिशा के रसगुल्ले को 'ओडिशा रसगोला' नाम से जीआई टैग दिया गया।