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राजस्थान में बना या मुगलों के साथ आया, क्या है सावन में खाई जाने वाली लाजवाब मिठाई ‘घेवर’ की कहानी?

Published: Tue, 21 Jul 2026 12:47 PM (IST)

घेवर के इतिहास और उत्पत्ति को लेकर कई दिलचस्प कहानियां हैं, जिसमें राजस्थान और मुगलों से जुड़े दावे शामिल हैं।

यूपी, राजस्थान या मिडिल ईस्ट... कहां से आया 'घेवर'? (AI Generated Image)

यूपी, राजस्थान या मिडिल ईस्ट... कहां से आया 'घेवर'? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। सावन का महीना आते ही मिठाइयों की दुकानें घेवर की खुबशबू से महक उठती हैं। ये गोल और जालीदार आकार की मिठाई अपने खास स्वाद के लिए जानी जाती है, लेकिन क्या आप इसका इतिहास जानते हैं? आइए जानें घेवर की दिलचस् कहानी।

कैसे हुई घेवर बनाने की शुरुआत?

सबसे पहली बार घेवर कहां और कैसे बनाया गया इसका कोई ठोस सबूत नहीं मिलता। हालांकि, कई लोगों का मानना है कि ये मिडिल ईस्ट से आए कारीगरों के साथ भारत आया। व्यापार के लिए जब वे भारत आए, तो अपने साथ घेवर लेकर आए थे और यहां के लोगों को ये मिठाई इतनी पसंद आई कि घेवर भारत की मुख्य मिठाइयों में से एक बन गया। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि जब मुगल बादशाह बाबर भारत आए, तो वो अपने साथ इस मिठाई को लेकर आए थे और धीरे-धीरे ये आम जनता तक पहुंचा। 

घेवर बनने की जगह को लेकर भी अक्सर विवाद रहा है। कुछ लोग मानते हैं कि घेवर सबसे पहले उत्तर प्रदेश में बनाया गया था और वहीं से इस मिठाई की शुरुआत हुई। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि घेवर राजस्थान की मिठाई है और इसे बनाने की शुरुआत भी राजस्थान में ही हुई थी। ज्यादातर लोग यहीं मानते हैं कि घेवर राजस्थान से जुड़ा है और सावन में आने वाले वहां के तीज-त्योहारों का खास हिस्सा रहा है। 

कैसे बनाया जाता है घेवर? 

घेवर एक जालीदार मिठाई है, जो मधुमखी के छत्ते जैसा होता है। इसलिए घेवर बनाने की तकनीक भी बहुत खास होती है। मैदा, घी और बर्फ का पानी मिलाकर एक पतला घोल तैयार किया जाता है, जो बहुत ठंडा होता है। इस घोल का ठंडा होना बहुत जरूरी है, क्योंकि तभी तलने पर इसमें मधुमखी के छत्ते जैसा टेक्सचर आएगा। इस घोल को एक गोल या षटकोण आकार के सांचे में उबलते हुए घी में धीरे-धीरे डाला जाता है। 

घी में जाते ही मैदा फैलकर जालीदार होने लगता है और इसी तरह लेयर पर लेयर डालते हुए घेवर का जालीदार सांचा बनाया जाता है। तलने के बाद घेवर को इलायची और केसर वाली चीनी की चाशनी में डुबोया जाता है। 

घेवर के अलग-अलग रूप

घेवर एक ऐसी मिठाई है, जिसके खुद में भी कई प्रकार हैं। एक सादा घेवर होता है, जिसमें सिर्फ मैदे की जालीदार परतें बनाई जाती हैं और उन्हें चीनी में डुबाया जाता है। इसके अलावा मावा या मलाई घेवर भी बनाया जाता है, जिसमें घेवर के ऊपर गाढ़ी रबड़ी, मलाई, पिस्ता और बादाम की परत सजाई जाती है। 

घेवर की शेल्फ लाइफ कितनी होती है?

घेवर को बनाने के लिए हवा में नमी होना बहुत जरूरी है। इसलिए इसे मुख्य रूप से बारिश के महीनों में बनाया जाता है और यही वजह है कि ये सावन में आने वाले त्योहारों से जुड़ा है। बिना चाशनी वाले घेवर को एक महीने तक स्टोर करके रखा जा सकता है और जब इसका इस्तेमाल करना हो, तब चाशनी बना सकते हैं। वहीं अगर घेवर में चाशनी या मलाई की परत लगाई गई है, तो इसे 3 दिनों तक रख सकते हैं। 

घेवर क सांस्कृतिक महत्व

घेवर राजस्थान की संस्कृति में रचा-बसा हुआ है। इसे खासतौर से तीज और रक्षाबंधन के त्योहारों पर जरूर बनाया जाता है। सावन के महीने में बेटी और बहनों के घर घेवर भेजने की परंपरा भी है, जो रिश्तों में मिठास और प्रेम का संदेश माना जाता है। 


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