कम उम्र में बढ़ रहा है कैंसर का जोखिम, क्या हैं इसके कारण और कैसे कर सकते हैं इससे बचाव?
लांसेट की एक रिपोर्ट बताती है कि कैंसर के 70 प्रतिशत मामलों में बचाव संभव है। ऐसे में इलाज के साथ-साथ शुरुआती जांच, किफायती थेरेपी, मजबूत डाटा सिस्टम ...और पढ़ें
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युवाओं में क्यों बढ़ रहे हैं कैंसर के मामले? (Picture Courtesy: Freepik)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
ब्रह्मानंद मिश्र, नई दिल्ली। भारतीय महिलाओं में 20 वर्ष की उम्र में ही स्तन कैंसर हो रहा है, युवा आबादी पेट कैंसर की चपेट में आ रही है। यहां तक कि धूमपान से दूर रहने वाले लोग भी फेफड़े के कैंसर के शिकार हो रहे हैं, ये बातें अलग-अलग शोध में लगातार सामने आ रही हैं। कुल मिलाकर कहें तो कैंसर अब बढ़ती उम्र या बुजुर्गों की ही बीमारी नहीं रही।
आज लगभग सभी परिवारों में कोई न कोई ऐसा करीबी या परिचित व्यक्ति जरूर मिल जाता है, जिसे कैंसर चिह्नित हो चुका होता है। हालांकि, फेफड़े, मुंह और स्तन जैसे आम तरह के अनेक कैंसर के उपचार में सफलता भी मिल रही है, पर कैंसर के मामलों में हो रही वृद्धि बड़ी आबादी के लिए बेहद चिंताजनक है।
राष्ट्रीय कैंसर रोकथाम एवं अनुसंधान संस्थान के हालिया (2024) अनुमान के मुताबिक 25 लाख भारतीय कैंसर पीड़ित हैं। यह आंकड़ा गत तीन दशकों में 26 प्रतिशत अधिक है। भारत में हर वर्ष कैंसर से छह लाख असामयिक मौतें हो रही हैं। सबसे अनिवार्य और त्वरित उपाय के तौर पर कैंसर की समय रहते जांच और रोकथाम अनिवार्य है। इसके बाद सर्जरी, रेडियोथेरेपी और कीमोथेरेपी जैसे उपाय कैंसर से बचाने में कारगर साबित हो सकते हैं।
क्या करने की है जरूरत?
हमें समझना होगा कि कैंसर जैसी असाध्य बीमारियों में प्रतिरक्षा (इम्युनिटी) ही सुरक्षा का सबसे अग्रिम कवच है। यह कैंसर और इसकी वापसी की आशंकाओं, दोनों को रोकता है। इम्यूनोथेरेपी कैंसर के इलाज में एक नया और कारगर तरीका है, जो कैंसर से लड़ने के लिए शरीर के इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है। बीमारियों के खिलाफ प्रतिरक्षा के लिए शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देने की जरूरत है।
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समझें कैंसर और इसके कारणों को
कैंसर बीमारियों का एक समूह है, जिसमें असामान्य कोशिकाएं बेकाबू होकर बढ़ती हैं और सामान्य कोशिकाओं की जगह ले लेती हैं। शरीर के किसी एक हिस्से में इस तरह की असमान्य कोशिकाएं अन्य अंगों को भी प्रभावित करने लगती हैं। अंतत: ये मेटास्टेसिस का रूप ले लेती हैं, जो मौत का कारण बन सकती हैं।
- जीन में बदलाव (म्यूटेशन)- जीन में होने वाले बदलाव के चलते कैंसर कोशिकाएं असामान्य हो जाती हैं। जीन में होने वाले ऐसे कुछ बदलाव एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ट्रांसफर हो सकते हैं, जबकि कुछ मामलों में यह अधिक उम्र में होने की आशंका रहती है।
- अनियंत्रित कोशिका वृद्धि- ज्यादातर असामान्य कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं या रिप्रोड्यूस नहीं हो पातीं। लेकिन, कैंसर कोशिकाएं असामान्य रूप से बढ़ती और विभाजित होती रहती हैं। इससे सामान्य कोशिकाएं भी बाधित होने लगती हैं।
- ट्यूमर बनना- सभी कैंसर कोशिकाएं ट्यूमर से नहीं होतीं और सभी ट्यूमर कैंसर नहीं होते। कई तरह की कैंसर कोशिकाएं एक साथ मिलकर ट्यूमर बनाती हैं।
क्यों होता है कैंसर?
कैंसर के अनेक चरण होते हैं। इन बदलाओं के पीछे व्यक्ति के जीन के अलावा भी कई अन्य कारण मौजूद होते हैं जैसे-
- फिजिकल कैंसरकारक- अल्ट्रावायलेट और आइनाजिंग रेडिएशन आदि।
- रासायनिक कैंसरकारक- एस्बेस्टस, तंबाकू का धुआं, अल्कोहाल, दूषित खाद्य, आर्सेनिक युक्त जल आदि।
- जैविक कैंसरकारक- कुछ खास तरह के वायरस, बैक्टीरिया या परजीवियों से होने वाला संक्रमण।
रिस्क फैक्टर
तंबाकू, शराब, सेहत के लिए हानिकारक भोजन, शारीरिक निष्क्रियता, वायु प्रदूषण जैसे कारक कैंसर और अन्य गैर-संचारी रोगों का कारण बनते हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, दुनियाभर में 13 प्रतिशत कैंसर के पीछे कार्सियोजेनिक संक्रमण जिम्मेदार होते हैं। इसमें एचपीवी से सर्वाइकल और हेपेटाइटिस बी, सी वायरस से लिवर कैंसर होने की आशंका रहती है।
कैंसर के आधे मामलों को रोकना संभव
जोखिमकारकों और बचाव उपायों से वर्तमान में 30 से 50 प्रतिशत कैंसर से बचाव किया जा सकता है। साथ ही शुरुआती जांच और सही इलाज से भी कैंसर के बोझ को कम किया जा सकता है।
कैंसर बचाव के लिए जरूरी बातें
- सही शारीरिक वजन
- स्वस्थ आहार। भोजन में पर्याप्त फल और सब्जियां
- प्रतिदिन शारीरिक सक्रियता और व्यायाम
- हर तरह के तंबाकू और अल्कोहाल से दूरी
- डाक्टर के परामर्श पर एचपीवी और हेपेटाइटिस बी वैक्सीन
- अल्ट्रावायलेट रेडिएशन से बचाव
- स्वास्थ्य देखभाल के दौरान सतर्कता
- आंतरिक और बाह्य वायुप्रदूषण से बचाव
क्यों जरूरी है शुरुआती जांच और स्क्रीनिंग?
शुरुआती जांच से कैंसर का प्रभावी और सस्ता इलाज किया जा सकता है। इससे कैंसर मरीज के जीवन को दोबारा सामान्य पटरी पर लौटाना संभव होता है। इसमें मुख्य रूप से तीन बातों का ध्यान जरूरी है- कैंसर के सभी लक्षणों को लेकर जागरूकता, असामान्य स्थिति होने पर मेडिकल परामर्श, क्लीनिकल जांच और सही उपचार। ये उपाय सभी तरह के कैंसर में प्रभावी हैं।
इसी तरह स्क्रीनिंग के माध्यम से भविष्य में होने वाली कैंसर की आशंकाओं को दूर किया जा सकता है। रूटीन जांच के दौरान असामान्य होने पर सही इलाज के लिए आगे की जांच की जा सकती है या बेहतर इलाज के लिए रेफर किया जा सकता है। स्क्रीनिंग कुछ मामलों में प्रभावी है। इससे रिस्क फैक्टर पर नजर रखने में मदद मिलती है।
- 15.3 लाख कैंसर के नए मामले भारत में रिपोर्ट हुए 2024 में (स्रोत :एनसीआरपी-आइसीएमआर)
- 8.7 लाख मौतें हुई कैंसर से 2024 में, 2015 में यह आंकड़ा 6.8 लाख था। एक दशक में 28.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
- 24.6 कैंसर के मामले आ सकते हैं 2045 तक भारत में, जामा नेटवर्क में प्रकाशित अनुमान के मुताबिक
भोजन कैसे बनता है कैंसर का कारण?
दशकों से अनेक शोध में यह स्पष्ट है कि कैंसर के खतरे को बढ़ाने में भोजन की बड़ी भूमिका होती है। लंबे समय तक खानपान की आदतें अनेक बीमारियों के जोखिम को बढ़ाती हैं।
- शाकाहार को प्राथमिकता- भोजन में अनाज, ताजे फल और सब्जियां, लीन या पौधा आधारित प्रोटीन होने से कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों, डायबिटीज और कैंसर की आशंका कम होती है। इस तरह के भोजन से इंसुलिन और इन्फ्लेमेशन का स्तर कम होता है। वहीं इंसुलिन और इन्फ्लेमेशन की अधिकता मोटापे और मेटाबोलिक सिंड्रोम का कारण बनते हैं, जो कैंसर के लिए अनुकूल साबित होते हैं। इससे कोशिकाओं का विभाजन बढ़ता है और डीएनए डैमेज होता है।
- मीट चुनने में सतर्कता- इंटरनेशनल एजेंसी फार रिसर्च आन कैंसर ने प्रोसेस्ड मीट को इंसानों के लिए कैंसरकारक बताया है। प्रोसेस्ड मीट से बचाव के साथ-साथ रेड मीट को सप्ताह में तीन से चार बार तक ही सीमित रखना चाहिए। अगर आप ग्रिल कर रहे हैं, तो एसिडिक मैरिनेड, जैसे कि सिट्रस या विनेगर आदि का प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि इससे बनने वाले कार्सिनोजेंस की मात्रा कम करने में मदद मिल सकती है। विशेषज्ञों की मानें मीट के बजाय मछली का सेवन कैंसर के जोखिम को कम करता है।
- अल्ट्रा प्रोसेस्ड भोजन से बचाव- शुगर युक्त मीठे पेय पदार्थ जैसे अनेक अल्ट्रा प्रोसेस्ड खाद्य कैंसर का कारण बनते हैं। अधिक शुगर और कैलोरी इंसुलिन रेजिस्टेंस और मोटापे को बढ़ाते हैं। अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड से आंतों की कार्यप्रणाली बाधित होती है और इन्फ्लेमेशन बढ़ता है।
- शराब पर नियंत्रण- यहां तक कि इसके हल्के सेवन से भी कुछ तरह के कैंसर को जोखिम रहता है। कैंसर रिस्क के लिए इसका कोई सेफ लेवल नहीं होता। अनेक शोध बताते हैं कि इससे कोलोरेक्टल कैंसर का जोखिम बढ़ जाता है।
- काफी, चाय और डेरी प्रोडक्ट- विशेषज्ञों की मानें तो दिनभर में दो से तीन कप काफी या चाय इंसुलिन रेजिस्टेंस और इन्फ्लेमेशन का स्तर कम करता है। इसमें उपलब्ध रसायन कोशिकाओं को नष्ट होने से बचाते हैं। हालांकि, इसमें अतिरिक्त शुगर मिलाने से बचना चाहिए। इसी तरह डेरी उत्पादों में कैल्शियम होने से पेट के कैंसर का जोखिम कम होता है। प्रोबायोटिक प्रोडक्ट से आंतें सेहतमंद रहती हैं।
मोटापे के जोखम को समझें
भोजन और कैंसर के बीच जोखिम की राह मोटापे से होकर गुजरती है। साक्ष्य बताते हैं कि ब्रेस्ट, कोलोरेक्टल, एंडोमीट्रियल, गैस्ट्रिक, किडनी, लिवर और पैंक्रियाटिक जैसे दर्जनों तरह के कैंसर मोटापे से जुड़े होते हैं। मोटापा केवल गलत खानपान ही नहीं, शारीरिक निष्क्रियता के चलते भी होता है।
इसमें आनुवंशिक कारण भी जिम्मेदार होते हैं। फिर भी, खानपान के जरिये अतिरिक्त बाडी फैट या वजन को नियंत्रित किया जा सकता है। फैट टिश्यू एस्ट्रोजन के स्तर को बढ़ाते हैं, जिससे ब्रेस्ट और एंडोमीट्रियल जैसे कैंसर की आशंका बढ़ती है। पेट में जमा होने वाली चर्बी, जिसे विसरल फैट भी कहते हैं, उससे इंसुलिन प्रतिरोध और सूजन में वृद्धि होती है। इससे बचाव के लिए मध्यम से तीव्रता वाली कम से कम 30 मिनट की एक्सरसाइज आवश्यक है। इससे इंसुलिन संवेदनशीलता बढ़ती है और सूजन व वजन में कमी आती है। सही वजन एक तरह कैंसर की खिलाफ लड़ाई से जरूरी तैयारी है।
जीवन के महत्व को समझना होगा
डॉ. एके दीवान, डायरेक्टर, सर्जिकल आन्कोलाजी, राजीव गांधी कैंसर अस्पताल, नई दिल्ली, बताते हैं कि इस वर्ष विश्व कैंसर दिवस की थीम है-यूनाइटेड बाय यूनिक। यह प्रत्येक मरीज की वैयक्तिक देखभाल के महत्व को दर्शाता है। प्रत्येक मरीज को केंद्रित रखते हुए उसके वास्तविक अनुभवों पर ध्यान जरूरी है। कैंसर लाखों को लोगों को प्रभावित करता है, पर प्रत्येक मरीज का अनुभव मेडिकल, सामाजिक और सांस्कृतिक वास्तविकताओं पर टिका होता है।
हर किसी के पास बताने के लिए अपनी कहानी होती है, पर लेकिन हर कोई एक शब्द से जुड़ा हुआ है उसका नाम है कैंसर। इसलिए जरूरी है कि हर कोई कैंसर को लेकर जागरूक बने। आप अपनी जीवनशैली को बदलिए। जीने के लिए आपके पास केवल ही जीवन है।