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    वैज्ञानिकों ने बनाई दुनिया की सबसे किफायती 'प्लेसेंटा-ऑन-चिप' तकनीक, प्रेग्नेंसी पर आसान होगी स्टडी

    Updated: Sun, 05 Jul 2026 09:36 AM (IST)

    भारतीय वैज्ञानिकों ने स्वदेशी 'प्लेसेंटा-ऑन-चिप' तकनीक विकसित की है, जो प्रयोगशाला में मानव प्लेसेंटा की जैविक गतिविधियों की नकल करती है। ...और पढ़ें

    अब बेहद कम खर्च में होगी प्रेग्नेंसी पर सटीक स्टडी (Image Source: AI-Generated)

    अब बेहद कम खर्च में होगी प्रेग्नेंसी पर सटीक स्टडी (Image Source: AI-Generated) 

    HighLights

    1. भारतीय वैज्ञानिकों ने स्वदेशी 'प्लेसेंटा-ऑन-चिप' प्लेटफॉर्म विकसित किया

    2. यह मानव प्लेसेंटा की जैविक गतिविधियों की नकल करता है

    3. गर्भावस्था की जटिलताओं और दवाओं के असर को समझने में सहायक

    प्रेट्र, नई दिल्ली। गर्भ में पल रहे शिशु के लिए प्लेसेंटा जीवनरेखा की तरह काम करता है। यही अंग मां से बच्चे तक आक्सीजन और पोषक तत्व पहुंचाता है, अपशिष्ट बाहर निकालता है, जरूरी हार्मोन बनाता है और गर्भस्थ शिशु की सुरक्षा करता है। इसके बावजूद गर्भावस्था के दौरान सीधे अध्ययन की कठिनाई के कारण प्लेसेंटा के बारे में विज्ञानियों की जानकारी अब तक सीमित रही है।

    अब भारतीय विज्ञानियों ने इस दिशा में बड़ी सफलता हासिल की है। मुंबई स्थित आइसीएमआर - नेशनल इंस्टीट्यूट फार रिसर्च आन वीमेंस हेल्थ और आइआइटी मुंबई के विज्ञानियों ने मिलकर स्वदेशी तकनीक से 'प्लेसेंटा - आन-चिप' प्लेटफार्म विकसित किया है। यह प्रयोगशाला में इंसानी प्लेसेंटा की तरह काम करता है और उसकी प्रमुख जैविक गतिविधियों को दोहराने में सक्षम है। इस शोध को प्रतिष्ठित 'बायोफैब्रिकेशन जर्नल' में प्रकाशित किया गया है।

    Alternatives to animal testing in pregnancy

    (Image Source: AI-Generated) 

    भ्रूण का विकास और दवाओं का असर

    विज्ञानियों के अनुसार यह चिप गर्भावस्था के दौरान होने वाली कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं, जैसे हार्मोन का निर्माण, मां से भ्रूण तक ग्लूकोज पहुंचाना, यूरिया जैसे अपशिष्ट को बाहर निकालना और प्लेसेंटा की सुरक्षा परत (बैरियर) के कामकाज की नकल करती है। यह गर्भकालीन मधुमेह (जेस्टेशनल डायबिटीज) जैसी परिस्थितियों में भी प्लेसेंटा की प्रतिक्रिया का अध्ययन करने में सक्षम है।

    शोधकर्ताओं का कहना है कि यह प्लेटफार्म गर्भावस्था की जटिलताओं को बेहतर ढंग से समझने, यह जानने में कि दवाएं प्लेसेंटा की बाधा को कैसे पार करती हैं और गर्भवती महिलाओं के लिए सुरक्षित उपचार विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इससे भ्रूण के विकास में रुकावट, प्री-एक्लेम्पसिया और जेस्टेशनल डायबिटीज जैसी समस्याओं पर शोध को भी नई गति मिलेगी।

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    आइसीएमआर के विज्ञानी प्रो. दीपक मोदी ने कहा कि हर इंसान जन्म से पहले प्लेसेंटा पर निर्भर रहता है, लेकिन यह सबसे कम समझे गए अंगों में से एक है। उनका कहना है कि इस तकनीक से विज्ञानियों को इंसानों से जुड़ा अधिक वास्तविक शोध माडल मिलेगा और जहां संभव होगा, वहां पशुओं पर होने वाले प्रयोगों की आवश्यकता भी कम होगी।

    विज्ञानियों के अनुसार दुनिया में उपलब्ध कई 'प्लेसेंटा-आन-चिप' प्रणालियां जटिल और महंगी हैं, जबकि भारतीय प्लेटफार्म को सरल, किफायती और सामान्य प्रयोगशालाओं में आसानी से उपयोग के अनुकूल बनाया गया है। इससे देश में गर्भावस्था और प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़े अनुसंधान को व्यापक बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

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