गर्भावस्था के तीन माह में ही जेस्टेशनल डायबिटीज की पहचान संभव, SGPGI की प्रोफेसर ने किया खुलासा
संजय गांधी पीजीआई की प्रो. इंदु लता साहू के शोध में गर्भावस्था के शुरुआती तीन माह में जेस्टेशनल डायबिटीज की पहचान संभव हुई है। ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
कुमार संजय, लखनऊ। गर्भावस्था के दौरान होने वाला मधुमेह (जेस्टेशनल डायबिटीज) मां और शिशु दोनों के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है, लेकिन अब इसकी पहचान शुरू के तीन माह में संभव है, जिसके बाद समय रहते इलाज से दुष्प्रभाव को रोका जा सकता है।
यह बात संजय गांधी पीजीआई मेटरनल एंड रिप्रोडक्टिव हेल्थ विभाग की प्रो. इंदु लता साहू के हालिया शोध में सामने आई है कि गर्भावस्था की पहली तिमाही में खून की एक विशेष जांच से भविष्य में होने वाले इस रोग का अंदाजा लगाया जा सकता है।
गर्भकालीन मधुमेह गर्भावस्था के दौरान होने वाली डायबिटीज का एक प्रकार है, जो आमतौर पर 24वें से 28वें सप्ताह के बीच विकसित होती है। यह तब होता है जब गर्भावस्था के हार्मोन इंसुलिन के कार्य में बाधा डालते हैं, जिससे रक्त शर्करा का स्तर बढ़ जाता है। शोध में मालिक्युलर मेडिसिन विभाग के डा. कृष्ण कांत और बायो स्टेटिक विभाग के डा. प्रभाकर मिश्रा भी शामिल रहे।
करीब 20 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं प्रभावित
प्रो. इंदु लता के मुताबिक, शोध में 120 गर्भवती महिलाओं को शामिल किया गया है। अध्ययन के दौरान सात से 13 सप्ताह के बीच महिलाओं के खून में ‘ग्लाइकोसाइलेटेड फाइब्रोनेक्टिन’ प्रोटीन का स्तर जांचा गया। बाद में 24 से 28 सप्ताह के बीच सामान्य ग्लूकोज टेस्ट (ओजीटीटी) से यह पता लगाया गया कि किन महिलाओं को मधुमेह हुआ।
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अध्ययन में पाया गया कि जिन महिलाओं को जेस्टेशनल डायबिटीज हुई, उनमें गर्भावस्था की शुरुआत में ही इस प्रोटीन का स्तर सामान्य महिलाओं की तुलना में कम था। यह जांच करीब 72 प्रतिशत तक सटीक संकेत देती है, जो शुरुआती स्क्रीनिंग के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
उन्होंने बताया कि जेस्टेशनल डायबिटीज के कारण बच्चे का वजन अधिक होना, प्रसव के दौरान जटिलताएं, समय से पहले प्रसव और मां में उच्च रक्तचाप जैसी समस्याएं हो सकती हैं। ऐसे में यदि पहली तिमाही में ही जोखिम का पता चल जाए तो खानपान, नियमित जांच और जीवनशैली में बदलाव कर इन खतरों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
यह अध्ययन हाल में ही जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर में प्रकाशित हुआ है। भारत में लगभग 20 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में जेस्टेशनल डायबिटीज पाई जाती है। शहरी क्षेत्र में यह आंकड़ा अधिक हो सकता है। मोटापा, पारिवारिक इतिहास और उम्र बढ़ने से खतरा बढ़ता है।
क्या हो सकते हैं नुकसान
मां के लिए:
- उच्च रक्तचाप (प्रीक्लेम्पसिया)
- आपरेशन (सी-सेक्शन) की संभावना बढ़ना
- भविष्य में टाइप-2 डायबिटीज का खतरा
नवजात को खतरा:
- जन्म के समय अधिक वजन (मैक्रोसोनिया)
- प्रसव के दौरान चोट या जटिलता
- समय से पहले जन्म
- जन्म के बाद शुगर कम होना (हाइपोग्लाइसीमिया)
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