युवाओं को खामोशी से शिकार बना रहा है फेफड़ों का कैंसर, शुरुआती लक्षणों को अनदेखा करना है सबसे बड़ी गलती
फेफड़ों का कैंसर अब केवल धूम्रपान करने वालों या बुजुर्गों की बीमारी नहीं रही, बल्कि 40 से कम उम्र के लोगों में भी इसके मामले बढ़ रहे हैं, जिनमें कई धू ...और पढ़ें

सिगरेट से दूर रहने वाले युवा भी क्यों हो रहे हैं लंग कैंसर का शिकार? (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आमतौर पर यह माना जाता रहा है कि फेफड़ों का कैंसर केवल ज्यादा उम्र वाले लोगों या फिर उन लोगों की बीमारी है, जो बहुत ज्यादा सिगरेट पीते हैं, लेकिन अब यह सोच बदलने का वक्त आ गया है।
आजकल 40 साल से कम उम्र के युवाओं में भी लंग कैंसर के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से कई मरीजों ने अपनी जिंदगी में कभी तंबाकू का सेवन नहीं किया होता है।
हालांकि, बुजुर्गों की तुलना में युवाओं में इसके मामले अभी भी कम हैं, लेकिन इस नए ट्रेंड ने डॉक्टरों को लंग कैंसर के जोखिमों के बारे में दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया है।

(Image Source: AI-Generated)
बीमारी की पहचान में देरी है सबसे बड़ी समस्या
युवाओं में लंग कैंसर के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि आमतौर पर लोग इस उम्र में कैंसर होने का शक ही नहीं करते। जब किसी युवा को लगातार खांसी, सांस फूलने, सीने में दर्द या बार-बार चेस्ट इन्फेक्शन की शिकायत होती है, तो उसे अक्सर एलर्जी, अस्थमा या कोई वायरल बीमारी मानकर टाल दिया जाता है।
इस गलतफहमी के कारण सही जांच होने में देरी हो जाती है और बीमारी अंदर ही अंदर बढ़ती रहती है।
इन लक्षणों को कभी न करें नजरअंदाज
आपकी उम्र जो भी हो और चाहे आप सिगरेट पीते हों या नहीं, अगर नीचे दिए गए लक्षण दिखें, तो तुरंत अलर्ट हो जाएं:
- 3 हफ्ते से ज्यादा समय तक रहने वाली खांसी
- खांसते समय मुंह से खून आना
- बिना किसी वजह के अचानक वजन कम होना
- लगातार थकान बनी रहना
- सीने में भारीपन या बेचैनी महसूस होना
सिगरेट नहीं पीते, फिर भी कैंसर क्यों?
यह सच है कि लंग कैंसर का सबसे बड़ा कारण आज भी धूम्रपान ही है, लेकिन अब यह इसका इकलौता कारण नहीं रह गया है। लगातार सामने आ रही रिसर्च बताती हैं कि युवाओं में लंग कैंसर के पीछे कई और गंभीर वजहें हो सकती हैं:
खबरें और भी
- सेकंड-हैंड स्मोक: दूसरों के छोड़े गए सिगरेट के धुएं के बीच रहना।
- वायु प्रदूषण: प्रदूषित हवा में लंबे समय तक सांस लेना।
- ऑक्यूपेशनल पॉल्यूशन: काम की जगह पर मौजूद हानिकारक केमिकल और धूल।
- जेनेटिक कारण: जेनेटिक म्यूटेशन और परिवार में कैंसर की हिस्ट्री।
युवा मरीजों में पाए जाने वाले लंग कैंसर में अक्सर कुछ खास तरह के जेनेटिक बदलाव देखे जाते हैं। यही वजह है कि ऐसे मामलों में बीमारी की सही पहचान के लिए मॉलिक्यूलर टेस्टिंग बहुत जरूरी हो गई है। इससे डॉक्टरों को मरीज के हिसाब से 'टारगेटेड थेरेपी' देने में मदद मिलती है, जिससे इलाज के नतीजे काफी बेहतर हुए हैं।
फिट दिखने का मतलब पूरी सुरक्षा नहीं
हम अक्सर सोचते हैं कि अगर हम अच्छी डाइट ले रहे हैं, वर्कआउट कर रहे हैं और फिट हैं, तो हमें लंग कैंसर जैसी बीमारी नहीं हो सकती। लेकिन सच यह है कि एक हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाकर आप खतरे को कम जरूर कर सकते हैं, लेकिन उसे पूरी तरह से खत्म नहीं कर सकते। इसलिए, अगर आपको लंबे समय से सांस या सीने से जुड़ी कोई परेशानी है, तो सिर्फ अपनी कम उम्र का हवाला देकर डॉक्टर के पास जाने से न बचें।
नई तकनीक और इलाज की उम्मीदें
राहत की बात यह है कि मेडिकल साइंस ने अब काफी तरक्की कर ली है। इम्यूनोथेरेपी, मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स, लो-डोज इमेजिंग और टेलर्ड थेरेपी जैसी नई तकनीकों ने लंग कैंसर के इलाज में क्रांति ला दी है। अगर बीमारी की पहचान शुरुआत में ही हो जाए, तो मरीज के बचने की संभावना काफी बढ़ जाती है और इलाज के भी कई बेहतर विकल्प मौजूद होते हैं।
(डॉ. विकास गोस्वामी, मैक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, वैशाली (गाजियाबाद) के मेडिकल ऑन्कोलॉजी के सीनियर डायरेक्टर हैं।)
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