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    12% ज्यादा डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं वे बुजुर्ग, जिनके बच्चे हैं बेरोजगार; सर्वे में खुलासा

    Updated: Thu, 02 Apr 2026 12:37 PM (IST)

    नए सर्वे में खुलासा हुआ है कि अगर वयस्क बच्चों के पास नौकरी नहीं है, तो बुजुर्ग माता-पिता में डिप्रेशन का खतरा बढ़ जाता है। ...और पढ़ें

    अगर घर में बच्चा है बेरोजगार, तो बुजुर्गों में बढ़ जाता है डिप्रेशन का खतरा (Image Source: AI-Generated)

    अगर घर में बच्चा है बेरोजगार, तो बुजुर्गों में बढ़ जाता है डिप्रेशन का खतरा (Image Source: AI-Generated) 

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारत में परिवार एक साथ मिलकर रहते हैं, जहां बच्चे बड़े होकर अपने माता-पिता की देखभाल करते हैं, लेकिन क्या होता है जब यही युवा पीढ़ी रोजगार से वंचित हो जाती है?

    हाल ही में हुए एक बड़े सर्वे में यह चौंकाने वाली बात सामने आई है कि अगर वयस्क बच्चों के पास नौकरी नहीं है, तो उनके बुजुर्ग माता-पिता में डिप्रेशन का खतरा 12 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।

    parental depression risk

    (Image Source: AI-Generated) 

    सर्वे में क्या सामने आया?

    यह अहम जानकारी 'लॉन्जिट्यूडिनल एजिंग सर्वे ऑफ इंडिया' के डेटा से हासिल हुई है। भारत के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा 2017-18 में यह सर्वे शुरू किया गया था, जिसमें 45 वर्ष और उससे अधिक उम्र के 73,000 से ज्यादा लोगों से जानकारी जुटाई गई।

    स्वीडन की उमेआ यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने इस डेटा का गहराई से अध्ययन किया। 'सोशल साइंस एंड मेडिसिन' नामक जर्नल में छपी इस रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों की बेरोजगारी के कारण माता-पिता के डिप्रेशन में जाने का खतरा लगभग 3.14 प्रतिशत से लेकर 12.48 प्रतिशत तकबढ़ जाता है। यह खतरा उन परिवारों में और भी ज्यादा होता है, जहां माता-पिता अपनी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा के लिए पूरी तरह से अपने बच्चों पर निर्भर हैं।

    भारत में इसका असर इतना ज्यादा क्यों है?

    भारत में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी बुजुर्ग आबादी रहती है, लेकिन यहां हर किसी के लिए कोई यूनिवर्सल हेल्थकेयर नहीं है।

    • बीमा की कमी: 60 साल या उससे अधिक उम्र के केवल 18% बुजुर्गों के पास ही हेल्थ इंश्योरेंस है।
    • पारिवारिक निर्भरता: आर्थिक मदद और स्वास्थ्य देखभाल के लिए बुजुर्ग मुख्य रूप से अपने बच्चों पर निर्भर होते हैं।

    उमेआ यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता ऋषभ त्यागी बताते हैं कि भारत में दोनों पीढ़ियां एक-दूसरे से बहुत करीब से जुड़ी हुई हैं। जब युवा पीढ़ी के हाथों से रोजगार छिन जाता है, तो बुजुर्ग बहुत ज्यादा असुरक्षित महसूस करने लगते हैं।

    Senior mental health India

    (Image Source: AI-Generated) 

    बड़े बेटे की नौकरी का मेंटल हेल्थ पर असर

    इस रिसर्च में एक खास सांस्कृतिक पहलू भी सामने आया। भारत में यह माना जाता है कि बुढ़ापे में बड़ा बेटा ही माता-पिता का सहारा बनेगा। यही कारण है कि जब घर की सबसे बड़ी बेटी के बजाय सबसे बड़े बेटे की नौकरी जाती है, तो माता-पिता के डिप्रेशन में जाने का खतरा कहीं अधिक होता है। बेटे से जुड़ी यह उम्मीद सीधे तौर पर माता-पिता की इमोशनल हेल्थ को प्रभावित करती है।

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    सामाजिक मेलजोल है कारगर दवा

    शोधकर्ताओं ने इस समस्या का एक बहुत ही स्पष्ट और सकारात्मक समाधान भी खोजा है- समाज के साथ जुड़कर रहना।

    भले ही परिवार बुजुर्गों के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है, लेकिन दोस्तों और समाज का साथ एक सुरक्षा कवच का काम करता है। जो बुजुर्ग सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं और लोगों से मिलते-जुलते रहते हैं, उनमें डिप्रेशन का खतरा काफी कम होता है- यहां तक कि तब भी जब उनके बच्चे बेरोजगार हों।

    इसके विपरीत, जो बुजुर्ग अलग-थलग या अकेले रहते हैं, उन पर बच्चों की बेरोजगारी का मानसिक असर बहुत तेजी से होता है और उनके डिप्रेशन में जाने का जोखिम सबसे ज्यादा होता है। इसलिए, बुजुर्गों के लिए यह बेहद जरूरी है कि वे घर से बाहर निकलें और समाज में अपनी उठ-बैठ बनाए रखें।

    Source: Social Science and Medicine Journal

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