बदलते मौसम में बढ़ जाता है अस्थमा का खतरा, इन चीजों से तुरंत बना लें दूरी, नहीं तो बढ़ेगी परेशानी
तापमान में उतार चढ़ाव, धूल-मिट्टी, पराग कणों के चलते इन दिनों अस्थमा की तकलीफ बढ़ जाती है। क्या है इससे बचाव का सही तरीका, आइए जानें।

अस्थमा के मरीजों के लिए क्यों खतरनाक है ये मौसम? (Picture Courtesy: Freepik)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। रात में अगर सांस लेने में कठिनाई महसूस होती है, छाती में कसाव/जकड़न, गले से सीटी जैसी आवाज आने जैसी समस्या होती है, तो इस मौसम में थोड़ा सतर्क होने की जरूरत है। डॉ. सूर्यकान्त (विभागाध्यक्ष, रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग, केजीएमयू, लखनऊ) बताते हैं कि इन दिनों अस्थमा की समस्या का सामना कर रहे लोगों को धूल, मिट्टी, पराग कणों के संपर्क में आने से बचना चाहिए।
अस्थमा जागरूकता को लेकर हर वर्ष मई महीने के पहले मंगलवार को अस्थमा दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष विश्व अस्थमा दिवस की थीम है- अस्थमा से पीड़ित हर व्यक्ति के लिए सूजन-रोधी इनहेलर की उपलब्धता।
दरअसल, अस्थमा (दमा) एक आनुवंशिक रोग है जिसमें रोगी की सांस की नलियां अतिसंवेदनशील होती है और कुछ कारकों के प्रभाव से उनमें सूजन आ जाती है। इससे रोगी को सांस लेने में कठिनाई होती है।
-1777353554929.jpg)
(Picture Courtesy: Freepik)
ऐसे कारकों में धूल (घर या बाहर की) या पेपर की डस्ट, रसोई का धुआं, नमी, सीलन, मौसम परिवर्तन, सर्दी-जुकाम, धूमपान, फास्टफूड, मानसिक चिंता, व्यायाम, पालतू जानवर एवं पेड़ पौधों एवं फूलों के परागकण तथा वायरस एवं बैक्टीरिया के संक्रमण आदि प्रमुख होते हैं।
जब अस्थमा के कारक मरीज के संपर्क में आते है तो शरीर में मौजूद विभिन्न रसायनिक पदार्थ (जैसे हिस्टामीन) स्रावित होते हैं जिनसे श्वास नलिकाएं संकुचित हो जाती है। श्वास नलिकाओं की भीतरी दीवार में लाली और सूजन आ जाती है और उसमें बलगम बनने लगता है। इन सभी से दमा के लक्षण पैदा होते है तथा बार-बार कारकों के संपर्क में आने से श्वास की नलिकाओं में स्थायी रूप से बदलाव हो जाते हैं।
गंभीरता को समझने की जरूरत
ग्लोबल बर्डन आफ अस्थमा रिपोर्ट के अनुसार विश्व में लगभग 34 करोड़ लोग अस्थमा से पीड़ित हैं, भारत में यह संख्या लगभग चार करोड़ है। जहां वैश्विक आंकड़ों के आधार पर वार्षिक मृत्यु दर 13 प्रतिशत है, वहीं भारत में वार्षिक मृत्यु दर 43 प्रतिशत है।
यह भारत के लिए अत्यंत भयावह एवं सोचनीय विषय है। दो तिहाई से अधिक लोगों में दमा बचपन से ही प्रारंभ हो जाता है। इसमें बच्चों को खांसी होना, सांस फूलना, सीने में भारीपन, छींक आना, नाक बहना तथा बच्चे का सही विकास न हो पाना जैसे लक्षण होते हैं।
शेष एक तिहाई लोगों में दमा के लक्षण युवा अवस्था में प्रारंभ होते हैं। दमा के इलाज में इन्हेलर चिकित्सा सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि इसमें दवा की मात्रा का कम इस्तेमाल होता है, असर सीधा एवं शीघ्र होता है एवं दवा के दुष्प्रभाव बहुत ही कम होते है।
लक्षणों के आधार पर उपचार
दमा का उपचार लक्षणों के आधार पर और कुछ परीक्षण करके जैसे फेफड़े की कार्यक्षमता की जांच (पीईएफआर, स्पाइरोमेट्री, इंपल्स ओस्लिमेटरी) द्वारा किया जाता है। अन्य जांचें जैसे कि खून की जांच, छाती और साइनस का एक्सरे इत्यादि भी किया जाता है।
दमा के इलाज के लिए दो तरह की दवाइयां होती हैं। वायुमार्ग खोलने के लिए वायुमार्ग की सूजन कम करने के लिए। इसके लिए इन्हेलर होते है जिनके द्वारा सांस के जरिये दवा सीधे फेफड़े में पहुचंती है और उसका शरीर के अन्य अंगों पर न्यूनतम प्रभाव पड़ता है। दमा के इलाज के लिए दो प्रमुख तरीके के इन्हेलर है।
- रिलीवर इन्हेलर- ये जल्दी से काम करके श्वांस की नलिकाओं की मांसपेशियों का तनाव ढीला करते है और तुरंत असर करते हैं। इससे सिकुड़ी हुई सांस की नलियां तुरंत खुल जाती हैं। इन्हें सांस फूलने पर लेना होता है।
- कंट्रोलर इन्हेलर- ये श्वास नलियों में उत्तेजना और सूजन घटाकर उनको अधिक संवेदनशील बनने से रोकते हैं और गंभीर दौरे का खतरा कम करते है। इन्हें लक्षण न होने पर भी लगातार लेना चाहिए।
बदलते मौसम में विशेष सतर्कता
बदलते मौसम और घटते-बढ़ते तापमान की स्थिति में विशेष रूप से सतर्क रहना चाहिए। हमेशा दवा अपने पास रखनी चाहिए और कंट्रोलर इन्हेलर हमेशा समय लेते रहना चाहिए। सिगरेट/सिगार, बीड़ी के धुएं और अन्य एलर्जन से बचना चाहिए।
अपने फेफड़े को मजबूत बनाने के लिए सांस का व्यायाम यानी प्राणायाम बहुत लाभकारी। यदि बलगम गाढ़ा हो गया है, खांसी, घरघराहट और सांस लेने में तकलीफ बढ़ जाए या रिलीवर इन्हेलर की जरूरत बढ़ जाए, तो तुरंत चिकित्सक से मिलना चाहिए।
इन दिनों ऐसे कार्यों से बचें
गांवों में इस समय गेहूं की कटाई (थ्रेसर से) चल रही है। ऐसे में भूसा और धूल से बचना जरूरी है। पंख या रेशम के तकिये का इस्तेमाल न करें। घर के अंदर फूलों वाले पौधे या ताजे फूलों को न रखें। सिगरेट/बीड़ी न पिएं। रोगी के घर में किसी अन्य को भी सिगरेट/बीड़ी न पीने दें।
रोगी एसी या कूलर के कमरे से एकदम गर्म हवा में बाहर न जायें। यात्रा के दौरान बच्चों को लेकर वाहन की खिड़की के पास न बैठें। बिना डाक्टर की सलाह के कोई दवा नहीं लेनी चाहिए। धुआं, धूल, मिट्टी वाली जगह से बिना नाक मुंह ढंके न गुजरें। अस्थमा रोगी इत्र, परफ्यूम का इस्तेमाल न करें।
प्रमुख एलर्जन के संपर्क में न आयें। घर में जानवरों को न पालें तथा घर में धूल को न जमने दें। मच्छरों को भागाने वाली कॉइल या अगरबत्ती आदि का इस्तेमाल न करें।
जानें कुछ जरूरी उपाय
- इन्हेलर व दवाएं विषेशज्ञ की सलाह के अनुसार ही लेनी चाहिए।
- धूल, धुंआ, गर्दा, नमी, सर्दी व धूमपान आदि से बचकर रहें।
- शीतलपेय, फास्टफूड तथा केमिकल व प्रिजरवेटिव युक्त खाद्य पदार्थो (चाकलेट, टाफी, कोल्ड ड्रिंक व आइसक्रीम आदि) से परहेज करें।
- सर्दी, जुकाम, गले की खरास या फ्लू होने इलाज कराना चाहिए, इससे बीमारी के बिगड़ने का खतरा रहता है।
- कारपेट, बिस्तर व चादरों की नियमित तथा सोने से पूर्व अवश्य सफाई करनी चाहिए।
- व्यायाम या मेहनत का कार्य करने से पहले इन्हेलर अवश्य लेना चाहिए।
- अगर में सांस फूलती है तो रात में सोने से पहले ही इन्हेलर तथा अन्य दवाएं उचित चिकित्सीय सलाह से लेने चाहिए।
- घर हवादार हो और सीलन से मुक्त हो। अस्थमा वाले व्यक्ति को तेज व ठंडी हवा से बचना चाहिए।
देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।