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पार्किंसंस की शुरुआती पहचान में क्यों हो जाती है चूक? न्यूरोलॉजिस्ट ने बताया बचाव का सही रास्ता

Published: Sat, 11 Apr 2026 09:04 AM (IST)

पार्किंसन डिजीज एक धीरे-धीरे बढ़ने वाली न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जिसके शुरुआती लक्षण इतने सामान्य होते हैं कि उन्हें पहचान पाना कई बार मुश्किल हो जाता है।

पार्किंसन का सही समय पर डायग्नोस होना क्यों होता है मुश्किल? (Image Source: AI-Generated)

पार्किंसन का सही समय पर डायग्नोस होना क्यों होता है मुश्किल? (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। पार्किंसन एक ऐसी न्यूरोलॉजिकल समस्या है जो शरीर में बहुत ही खामोशी और धीमी गति से फैलती है। इस बीमारी के साथ सबसे बड़ी परेशानी यह है कि इसके शुरुआती इशारे इतने मामूली होते हैं कि मरीज और डॉक्टर, दोनों से ही इसे पहचानने में अक्सर चूक हो जाती है।

आइए, दिल्ली के पीएसआरआई (PSRI) अस्पताल के न्यूरोलॉजी कंसल्टेंट डॉ. भास्कर शुक्ला से समझते हैं कि आखिर क्यों पार्किंसन का सही समय पर डायग्नोस होना इतना मुश्किल होता है।

Neurologist advice for Parkinson

(Image Source: AI-Generated)

आम समस्याओं से खा जाते हैं धोखा

जब किसी व्यक्ति को हाथ-पैरों में हल्का कंपन महसूस होता है, शरीर में अकड़न आती है, चलने की रफ्तार धीमी हो जाती है या संतुलन डगमगाने लगता है, तो अक्सर लोग इसे कोई बीमारी नहीं मानते। ज्यादातर मामलों में मरीज इन शारीरिक बदलावों को सिर्फ बढ़ती उम्र का तकाजा, दिनभर की थकान या फिर मानसिक तनाव समझकर टाल देते हैं।

इसके अलावा, पार्किंसन शुरुआत में कुछ बेहद मामूली संकेत देता है, जैसे:

  • लिखते समय अक्षरों का छोटा हो जाना।
  • बातचीत के दौरान आवाज का धीमा पड़ जाना।
  • चेहरे के हाव-भाव में कमी आना।

मरीज खुद भी इन बदलावों पर ध्यान नहीं देते, जिससे बीमारी अंदर ही अंदर बढ़ती रहती है।

दूसरी बीमारियों से मिलती-जुलती पहचान

इस बीमारी को पहचानने में एक बड़ी रुकावट इसके लक्षणों का अन्य आम बीमारियों से मेल खाना है। पार्किंसन के शुरुआती लक्षण बिल्कुल अर्थराइटिस, मांसपेशियों की कमजोरी या फिर डिप्रेशन और एंग्जायटी जैसे ही महसूस होते हैं। लक्षणों की इसी समानता के कारण कई बार डॉक्टर भी उलझन में पड़ जाते हैं और जब तक संकेत पूरी तरह स्पष्ट न हों, तब तक इसे कोई और समस्या मान लिया जाता है।

किसी एक सटीक जांच का उपलब्ध न होना

मेडिकल साइंस में फिलहाल ऐसा कोई एक सीधा और पक्का टेस्ट नहीं है जिससे तुरंत पार्किंसन की पुष्टि की जा सके। किसी भी डॉक्टर को इस बीमारी का पता लगाने के लिए मुख्य रूप से मरीज के पुराने मेडिकल इतिहास, वर्तमान लक्षणों और न्यूरोलॉजिकल जांच पर ही निर्भर रहना पड़ता है। चूंकि शुरुआती लक्षण बहुत हल्के होते हैं, इसलिए पक्के तौर पर बीमारी की पहचान करना डॉक्टरों के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन जाता है।

जागरूकता ही है बचाव का रास्ता

डॉ. भास्कर शुक्ला इस बात पर जोर देते हैं कि पार्किंसन को लेकर लोगों में जागरूकता होना बहुत जरूरी है। अगर आपको या आपके किसी परिचित को लगातार शरीर में कंपन महसूस हो, चलने में धीमापन आ जाए या शरीर का संतुलन बनाए रखने में परेशानी हो, तो बिना देर किए किसी न्यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करना चाहिए।

अगर सही वक्त पर इस बीमारी को पकड़ लिया जाए, तो न सिर्फ इसके बढ़ने की रफ्तार को सफलतापूर्वक काबू में रखा जा सकता है, बल्कि मरीज लंबे समय तक एक बेहतरीन और सामान्य जिंदगी जी सकता है।

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