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    क्या आप भी उदासी छिपाने के लिए रील्स देखते हैं? सोशल मीडिया कैसे बन रहा भावनाओं से भागने का जरिया

    Updated: Mon, 25 May 2026 02:22 PM (IST)

    उदास या परेशान होने पर आप भी बार-बार सोशल मीडिया चेक करना शुरू कर देते हैं? दरअसल, इसके पीछे आपके दिमाग का गहरा खेल है। ...और पढ़ें

    क्या सोशल मीडिया स्क्रॉल करने से दूर हो जाती है उदासी? (Picture Courtesy: Freepik)

    क्या सोशल मीडिया स्क्रॉल करने से दूर हो जाती है उदासी? (Picture Courtesy: Freepik)

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आपने कभी ध्यान दिया है, अगर आप बहुत परेशान या दुखी होते हैं, तो आपकी हाथ खुद की सोशल मीडिया की ओर बढ़ने लगता है। देर रात तक ट्वीट्स स्क्रॉल करना, रील्स को लगातार स्वाइप करना या बार-बार ऑनलाइन स्टेटस चेक करके हम अपना ध्यान भटकाने की कोशिश करते हैं। 

    इसे डिजिटल एस्केपिज्म कहते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? क्यों अपनी परेशानियों को भुलाने या ध्यान भटकाने के लिए हम सोशल मीडिया का सहारा लेते हैं? आइए इन सवालों का जवाब डॉ. गायत्री भाटिया (एसोशिएट प्रोफेसर एंड कंसल्टेंट साइकायट्रिस्ट, अमृता हॉस्पिटल, फरीदाबाद) से जानते हैं। 

    तुरंत डोपामाइन रिलीज होना 

    डॉ. भाटिया बताती हैं कि जब इंसान मानसिक रूप से परेशान या उदास होता है, तो उसका दिमाग तुरंत राहत तलाशता है। सोशल मीडिया इस राहत को पाने का सबसे आसान जरिया है। जैसे ही हम कोई नई रील देखते हैं या हमारे किसी पोस्ट पर लाइक और कमेंट आता है, तो दिमाग में डोपामाइन रिलीज होता है। इसे फील-गुड हार्मोन भी कहा जाता है। यह कुछ समय के लिए हमारे असली दर्द या तनाव को कम कर देता है और हमें खुशी का एहसास देता है।

    अकेलेपन और चुप्पी का डर

    अक्सर उदासी या तनाव में जब इंसान अकेला बैठता है, तो उसके भीतर के नकारात्मक विचार और बढ़ने लग जाते हैं। उस मानसिक असहजता को बर्दाश्त करना मुश्किल होता है। सोशल मीडिया इस खालीपन को तुरंत रंग-बिरंगे कंटेंट, म्यूजिक और मीम्स से भर देता है। यह लोगों को इल्यूजन ऑफ कनेक्शन देता है। यूजर को लगता है कि वह अकेला नहीं है, बल्कि एक बड़ी दुनिया का हिस्सा है, भले ही वह कनेक्शन असली न हो।

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    डूम-स्क्रॉलिंग और रिवॉर्ड साइकिल

    कई बार लोग थकान या मानसिक तनाव के बावजूद घंटों फोन चलाते रहते हैं, जिसे डूम-स्क्रॉलिंग कहा जाता है। यह इंटरमिटेंट रीइन्फोर्समेंट के कारण होता है। यानी, हमारा दिमाग इस उम्मीद में स्क्रॉल करता रहता है कि शायद अगला वीडियो ज्यादा मजेदार होगा या शायद अगला नोटिफिकेशन कोई अच्छी खबर लाएगा। 

    इस आदत से क्या नुकसान हो सकते हैं?

    परेशानियों से ध्यान भटकाने का यह तरीका मानसिक स्वास्थ्य के लिए बिल्कुल अच्छा नहीं है। 

    • भावनाओं को दबाना- यह आपकी असली समस्या को हल करने के बजाय उसे केवल कुछ समय के लिए टाल देता है।
    • तुलना का जाल- सोशल मीडिया पर दूसरों की परफेक्ट जिंदगी देखकर इंसान अपनी जिंदगी से और ज्यादा निराश होने लगता है।
    • नींद और फोकस में कमी- देर रात तक स्क्रीन देखने से स्लीप साइकिल बिगड़ती है, जिससे तनाव और चिड़चिड़ापन और बढ़ जाता है।

    इलाज क्या है?

    डॉ. भाटिया बताती हैं कि सोशल मीडिया अपने आप में बुरा नहीं है, बशर्ते इसका इस्तेमाल मनोरंजन के लिए हो, न कि अपनी भावनाओं से भागने के लिए। अगर आपको भी स्क्रीन से दूर होने पर बेचैनी होती है या स्क्रॉलिंग के बाद दुख और बढ़ जाता है, तो सचेत होने की जरूरत है। 

    अपनी परेशानियों से निपटने के लिए स्क्रीन के बजाय असल दुनिया का रुख करें। किसी दोस्त से दिल की बात कहें, डायरी लिखें, प्रकृति के बीच समय बिताएं या कोई हॉबी अपनाएं।