सिर्फ कुंडली मिलान ही काफी नहीं, शादी से पहले 'ब्लड टेस्ट' भी है जरूरी; डॉक्टर समझा रहे हैं वजह
भारतीय शादियों में जब बात रिश्तों की आती है, तो हम ग्रहों की चाल से लेकर खानदान के इतिहास तक ...और पढ़ें

कैसे 'जेनेटिक टेस्टिंग' बदल रही है भारतीय शादियों का चलन? (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज 8 मई को दुनियाभर में International Thalassaemia Day मनाया जा रहा है। भारतीय शादियों में आज भी सबसे ज्यादा जोर कुंडली, जाति, परिवार की इज्जत और कमाई पर दिया जाता है और सेहत से जुड़ी बातें, खासकर थैलेसीमिया जैसी जेनेटिक बीमारियों की चर्चा, अक्सर शर्मिंदगी के डर से छिपा ली जाती हैं।
हालांकि, अब इस सोच में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव आ रहा है। बेंगलुरु के नारायण हेल्थ सिटी अस्पताल में सीनियर कंसल्टेंट और डायरेक्टर डॉ. शरत दामोदर के मुताबिक, बड़े शहरों के साथ-साथ अब छोटे शहरों में भी डॉक्टर होने वाले जीवनसाथियों को शादी से पहले एक साधारण ब्लड टेस्ट कराने की सलाह दे रहे हैं। इसका मकसद यह जानना है कि कहीं वे 'थैलेसीमिया कैरियर' तो नहीं हैं।

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पार्टनर का थैलेसीमिया स्टेटस जानना बेहद जरूरी
थैलेसीमिया खून से जुड़ी एक ऐसी बीमारी है जो माता-पिता से बच्चों में जाती है। सबसे हैरानी की बात यह है कि जो व्यक्ति इसका 'कैरियर' होता है, वह देखने में पूरी तरह स्वस्थ होता है और उसकी रोजमर्रा की जिंदगी बिल्कुल सामान्य होती है।
समस्या तब आती है जब दो 'कैरियर' आपस में शादी कर लेते हैं। ऐसे कपल के बच्चे को 'थैलेसीमिया मेजर' होने की 25 प्रतिशत (4 में से 1) आशंका होती है। इस गंभीर स्थिति में बच्चे को जीवित रखने के लिए जीवन भर बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। यही कारण है कि परिवार बढ़ाने से पहले इस बारे में जानना बेहद जरूरी है।
शादियों में बढ़ा प्री-मैरिटल स्क्रीनिंग का नया चलन
जिन समुदायों में थैलेसीमिया का प्रभाव ज्यादा है, वहां अब शादियों के दौरान एक नया चलन देखने को मिल रहा है। कई परिवार अब लड़का-लड़की की डिग्रियों और कुंडली के साथ-साथ 'प्री-मैरिटल स्क्रीनिंग' की रिपोर्ट भी मांग रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी इस जेनेटिक जांच को एक जिम्मेदारी के तौर पर देखती है। स्वास्थ्य संस्थाएं भी शादियों के सीजन से ठीक पहले जागरूकता अभियान चलाकर इस बदलाव को बढ़ावा दे रही हैं। यह टेस्ट न केवल सीधा है, बल्कि काफी सस्ता भी है।

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आज भी मेडिकल रिपोर्ट छिपाने को मजबूर हैं लोग
इन तमाम बदलावों के बावजूद, समाज में अभी भी भारी गलतफहमियां मौजूद हैं। लोग 'कैरियर' होने का मतलब बीमारी समझ लेते हैं, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। एक कैरियर व्यक्ति सामान्य रूप से माता-पिता बन सकता है, लेकिन इस अज्ञानता के कारण समाज में भेदभाव पैदा होता है।
लोग डर के मारे अपनी रिपोर्ट छिपाते हैं ताकि रिश्ता न टूट जाए। इस स्थिति में सबसे ज्यादा नुकसान महिलाओं को उठाना पड़ता है, क्योंकि ससुराल वाले उनके बच्चे पैदा करने की क्षमता पर शक करने लगते हैं। वहीं, बुजुर्ग पीढ़ी भी इन जांचों को पारंपरिक रीति-रिवाजों में एक बेवजह की रुकावट मानकर इसका विरोध करती है।

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उम्रभर की तकलीफ से बचा सकती है छोटी-सी सावधानी
सही जानकारी न होने के कारण भारत में आज भी कई बच्चे थैलेसीमिया मेजर के साथ पैदा होते हैं। दूसरी ओर, साइप्रस और ईरान जैसे देशों ने शादी से पहले टेस्टिंग और काउंसलिंग के जरिए इस बीमारी पर काफी हद तक काबू पा लिया है। भारत में भी अब इस दिशा में बदलाव देखने को मिल रहे हैं। कुछ लोग अपनी मैट्रिमोनियल प्रोफाइल में अपनी सेहत और ब्लड ग्रुप की जानकारी पूरी ईमानदारी से देने लगे हैं।
अब बात सिर्फ एक मेडिकल टेस्ट की नहीं है, बल्कि यह दो परिवारों के बीच पारदर्शिता और विश्वास का प्रतीक बन चुका है। भारतीय समाज हमेशा से बदलावों को अपनाता आया है, अब देखना यह है कि क्या हम इस वैज्ञानिक सच्चाई को डर और भेदभाव के बजाय, पूरी समझदारी और सहानुभूति के साथ अपनाने के लिए तैयार हैं।
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