दारुवाला, बाटलीवाला, पूनावाला… पारसी समुदाय के सरनेम इतने अनोखे क्यों होते हैं? वजह जानकर हैरान हो जाएंगे आप
भारतीय पारसी समुदाय के अनोखे सरनेम जैसे दारुवाला और बाटलीवाला के पीछे दिलचस्प और ऐतिहासिक कहानी है। ...और पढ़ें

पारसी समुदाय के सरनेम की कहानी (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आपने भारतीय पारसी समुदाय के लोगों के सरनम पर कभी गौर किया है? इनके सरनेम सुनने में काफी अलग लगते हैं, जैसे- दारुवाला, बाटलीवाला, स्क्रूवाला।
पहली बार सुनने में ये हैरान करने वाले लगते हैं, लेकिन इन सरनेम्स के पीछे की कहानी काफी दिलचस्प है। आइए जानें भारतीय पारसियों के दारूवाला और बाटलीवाला जैसे सरनेम के पीछे छिपी ऐतिहासिक कहानी।
भारत पहुंचे पारसी
पारसी मूल रूप से फारस यानी आज के ईरान के क्षेत्र के रहने वाले थे। 8वीं शताब्दी में धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए वे फारस छोड़कर भारत आए और गुजरात में बस गए। उस समय पारसियों में सरनेम रखने का कोई चलन नहीं था। वे सिर्फ अपना नाम और उसके साथ अपने पिता का नाम जोड़ते थे।
पारसी भारत में बस गए और सालों तक इसी तरह रहने लगे, लेकिन जब भारत पर ब्रिटिशर्स का कब्जा हुआ, तब एक मुसीबत सामने आई। 19वीं शताब्दी में अपनी प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए अंग्रेजों ने जनगणना और टैक्स के रिकॉर्ड के लिए नाम के पीछे सरनेम लगाना जरूरी कर दिया। अब नाम के आगे सिर्फ पिता का नाम लगाने से काम नहीं चलने वाला था और पारसियों को सरनेम की जरूरत पड़ी, ताकि जनगणना में वे अपना नाम लिखवा सकें।
पेशा बना पहचान
अंग्रेजों की इस डिमांड को पूरा करने के लिए पारसियों ने अपने परिवार के पेशे या व्यापार को ही अपना सरनेम बना लिया। इसी तरह जो दवा-दारू बेचने का काम करते थे, वो बने दारुवाला। जो परिवार कांच की बोतल बेचते थे उन्होंने अपना सरनेम बनाया बाटलीवाला, जो सोडा की बोलतें खोने के उपकरण बनाते थे, उन्होंने अपना सरनेम रखा सोडाबोतलओपनरवाला रखा।
इसी तरह लोहे का काम करने वाले लोखंडवाला कहलाए और भी कई पारसी सरनेम, जो आज हमें सुनने को मिलते हैं, वो उनके परिवार के पेशे से जुड़े थे। कुछ लोगों ने अपने सरनेम इंजीनियर, मर्चेंट जैसे भी रखें, जो ब्रिटिश प्रशासन में उनके पेशे से जुड़े थे।
खबरें और भी
जगह के नाम पर भी रखे सरनेम
पारसियों ने सिर्फ पेशे के आधार पर ही नहीं, बल्कि वो जिस जगह या शहर में रहते थे, उससे जोड़कर भी सरनेम रखें, जैसे जो पुणे में रहने वाले पूनावाला कहलाए और सूरत में रहने वाले सूरतवाला। इसी तरह सरनेम्स की लिस्ट में और भी कई सरनेम शामिल हुए जो जगह के आधार पर रखे गए थे।
इस तरह अपने पेशे और रहने के स्थान के आधार पर पारसियों ने अपने सरनेम बनाए, जो आज भी चल रहे हैं और उनकी पहचान बन चुके हैं।