शादी या सौदा? दहेज की कीमत अपनी जान देकर चुका रहीं बेटियां, हर 90 मिनट में एक मौत
आंकड़े बताते हैं कि हर 90 मिनट में एक महिला की मौत दहेज के कारण हो रही है। समाज बदला है, लेकिन दहेज को लेकर लोगों की सोच नहीं बदली। ...और पढ़ें

'शादी बचाओ' नहीं, 'बेटी बचाओ'! (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। नोएडा की दीपिका, भोपाल की त्विषा, कर्नाटक की ऐश्वर्या, जयपुर की अनु। ये वे नाम हैं जिन्होंने विवाह के कुछ समय बाद ही ससुराल में अपनी जानें गवां दीं। हालांकि, दोनों पक्ष की तरफ से आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है, पर पीड़ित परिवार का दावा है कि दहेज के नाम पर दबाव डाला गया था।
वास्तव में रोजाना सामने आती हैं ऐसी दिल दहलाने वाली घटनाएं (Dowry Deaths in India)। इनमें कुछ अखबारों, मीडिया की सुर्खियां बनती हैं। इंटरनेट मीडिया पर हैशटैग के हवाले से लड़कियों को न्याय दिलाने की गुहार लगाई जाती है। पूरा माहौल तंज-गुस्सा-नाराजगी से गर्म हो उठता है और फिर से सुलगने लगते हैं वही सवाल कि आखिर कब तक सामाजिक प्रतिष्ठा व झूठे मानदंडों पर खरा उतरने की जिद के आगे दम तोड़ती रहेंगी बेटियां?
हाल ही में आई एनसीआरबी के आंकड़े भी कह रहे हैं कि यह समस्या कितनी विकराल है। महज कानून के बल पर दहेज रूपी दानव को खत्म करने की बात बेमानी सी हो गई है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (NCRB) के द्वारा जारी नए आंकड़ों के मुताबिक, भारत में वर्ष 2024 के दौरान दहेज हत्या के 5,737 मामले दर्ज किए गए। हर दिन दहेज के नाम पर औसतन 16 महिलाओं की जानें जा रही हैं।

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दशकों पुरानी लड़ाई
वर्ष 1914 की एक दोपहर स्नेहलता मुखोपाध्याय ने खुद को आग के हवाले इसलिए किया था, क्योंकि उनके पिता नहीं जुटा पाए दहेज का जरूरी सामान। यह आजादी पूर्व की एक घटना थी और यूं ही एक के बाद दूसरी घटनाएं सामने आती गईं। दहेज विरोधी कानून (Anti Dowry Act) वर्ष 1961 में बना, पर इससे सुधार नहीं हुआ। हां, बस एक कानून तो है इसकी तसल्ली जरूर मिली। हालांकि, दहेज प्रथा को खत्म करने की लड़ाई सामाजिक सुधार संगठनों के द्वारा निरंतर जारी है।
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दिल्ली के मॉडल टाउन की तरविंदर कौर हों, मालवीय नगर की कंचन चोपड़ा, शशिबाला चड्ढा। दहेज के कारण इन सबकी मौत के बाद दहेज विरोधी आंदोलन को जैसे एक बड़ा आधार मिला, पर नहीं रुका दहेज के नाम दुल्हनों को मारने का खूनी खेल।
भले ही दुल्हनों को आग में झोंकने की घटना कम हो गई है, पर उन्हें प्रताड़ित करने के दूसरे रास्ते तलाश लिए गए हैं। इन्हीं में एक क्रूर तरीका है- बार-बार ताने-उलाहने देकर नई दुल्हनों का आत्मविश्वास कुंद कर देना और अंतत: आत्महत्या के लिए बाध्य कर देना। एनसीआरबी रिपोर्ट बताती है कि प्रति 90 मिनट में एक महिला की मौत दहेज के नाम पर हो रही है और इसमें आत्महत्या का ग्राफ भी तेजी से बढ़ा है।
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शिक्षा नहीं सोच की बात
एक टीवी सेट, दस हजार का फर्नीचर, एक अलमारी, चीनी मिट्टी के बर्तन, स्टील के बर्तन आदि। एक दौर था जब दुल्हनें अपनी ससुराल इन सामानों के साथ जाती थीं। मायके में बड़े शान से माता-पिता बिटिया को दिए जाने वाले सामानों की नुमाइश करते तो ससुराल वाले भी अपने समाज बिरादरी में इन्हें अपनी प्रतिष्ठा का सामान बताने में गर्व महसूस करते।
अब समय के साथ दहेज में दिए जाने वाले सामानों की सूची बदली, लंबी हुई, स्तर-बढ़ा। ये और महंगे होते गए। दहेज का स्वरूप भी बदल गया। जैसे, कभी लड़के की पढ़ाई, करियर या बिजनेस में मदद के नाम पर तो कभी मकान खरीदने के लिए लड़की वाले इसके मूल्य चुकाने लगे।
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जब लड़के का परिवार कहने लगा कि अपनी बेटी को जो देना हो, खुशी से दीजिए तो परिवार इसके लिए कैसे रुके। वे कार, घर, एफडी, ब्रांडेड कपड़े और जेवर जैसी महंगी चीजें देने के लिए आतुर हो गए। सगाई, तिलक, शादी समारोह, खाने-पीने की व्यवस्था, सजावट, वेन्यू और दूसरी रस्मों पर दिल खोलकर खर्च किया जाने लगा। हां, यह दहेज नहीं कहलाया, बल्कि बिटिया की खुशी के नाम पर होने लगा है, पर यही सब जब शादी के बाद बिटिया को प्रताड़ित करने का हथियार बन जाता है तो इसका क्या उपाय करें माता-पिता समझ नहीं पाते।
भले ही सब अच्छी तरह जानते हों कि दहेज गैर कानूनी है, इसके बावजूद इस अनैतिक प्रथा को बनाए रखने में चाहे शिक्षित हों या कम पढ़ा-लिखा समाज सबने बराबरी से भागीदारी की है, पर सवाल यही है कि शिक्षित समाज भी क्यों इस गैरकानूनी कार्य में योगदान कर रहा है?
बता दें कि जिस शहरी इलाके या महानगरों में अधिक संपन्न व शिक्षित लोगों के होने की बात की जाती है, वहां दहेज हत्या सबसे अधिक हो रही है। एनसीआरबी रिपोर्ट के अनुसार, दहेज हत्या में दिल्ली देश में सबसे शीर्ष पर है। इस संदर्भ में समाजशास्त्री ऋतु सारस्वत कहती हैं कि शिक्षा का इस कुप्रथा से कोई सरोकार नहीं। भारी-भरकम डिग्रियों का इससे कोई मतलब नहीं है। दहेज सचमुच लड़कियों की सशक्तीकरण की राह का बड़ा रोड़ा है। वे कोई वस्तु नहीं जो दहेज से उनका मूल्य आंका जा सके।

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तो क्या करें माता-पिता
त्विषा शर्मा हों या दीपिका नागर, जान गवांने से पूर्व उनके परिवार वालों को पता था कि उनकी बेटियां किस मनोदशा से गुजर रही हैं। वे उन्हें एक ही सीख देते हैं कि परिवार बसाने में कठिनाइयां आती हैं। शायद ये भी उसी प्रकिया का अंग हो सकता है, पर सहसा पता चलता है कि दहेज उनकी बेटियों का काल बनकर बरपा है तो सिवाय पछताने के कुछ हासिल नहीं होता।
यह एक ऐसी टीस है जो सालों से हर उस मां-बाप के सीने में धंसी हुई है जिनकी बेटियों ने जुल्म सहते हुए दम तोड़ दिया। यह टीस व उससे उपजा दर्द उन तरविंदर कौर का भी था जो जलाए जाने से कुछ दिन पहले अपने पिता और भाई से मिलकर आईं थी, पर वे इसे वैवाहिक जीवन की आम समस्या समझकर टाल गए। यह टीस त्विषा शर्मा के माता-पिता व दीपिका नागर के परिवार वालों के मन में भी है, पर वे बिटिया की मौत के बाद के झंझावातों में उलझकर रह गए हैं।
इस बारे में मनोवैज्ञानिक काउंसलर स्नेहा वशिष्ठ कहती हैं, अब समय है कि हर माता पिता यह तय करें कि शादी बचाने की प्राथमिकता से अच्छा है कि बिटिया की जिंदगी बचा लें, पर हिंसायुक्त माहौल में उनकी जिंदगी कैसे बच सकती है? इसके लिए जरूरी है कि बिटिया को शुरू से इतना आत्मविश्वास जरूर दें कि वह कभी आत्मसम्मान से समझौता न करे और इसमें उसके मां-बाप और परिवार वाले उसका पूरा साथ दें।