कभी MP-गुजरात के जंगलों में गूंजता था ये आदिवासी लोकगीत, आज बन चुका है पार्टियों की पहचान
भारत अपनी संस्कृति के साथ-साथ अपनी लोककलाओं के लिए भी पूरी दुनिया में जाना जाता है। यहां कई ऐसे लोकगीत हैं, जो किसी एक क्षेत्र में सीमित नहीं है। ऐसा ...और पढ़ें
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आदिवासी लोकगीत 'हमु काका बाबा ना पोरिया रे' बना ग्लोबल डांस सेंसेशन (Picture Credit- AI Generated)

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जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। देशभर में कई ऐसे लोकगीत गाए जाते हैं, जो अपनी बोली और धुन की वजह से काफी पसंद किए जाते हैं। इन गीतों में भारत में विविधता साफ देखने को मिलती है। ऐसा ही एक लोकगीत मध्य प्रदेश के निमाड़ में काफी मशहूर है।
आज हम जिस गीत की बात करने वाले हैं, वह असल में एक आदिवासी लोकगीत है, जो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद अब कई लोगों की जुबां तक पहुंच चुका है। दरअसल, हम जिस गीत की बात कर रहे हैं, वह है- "हमु काका बाबा ना पोरिया रे"। आइए जानते हैं इस गीत के बारे में विस्तार से-
कहां गाया जाता है यह गीत?
यह गीत पश्चिमी भारत के आदिवासी समुदायों के बीच काफी ज्यादा प्रचलित है। यह मुख्य रूप से भील, भिलाला और राठवा जनजातियों की मौखिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है। गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों से निकला यह लोकगीत राठवाली और भीली बोलियों में गाया जाता है।
दरअसल, ये इलाके घने जंगलों से घिरे हुए थे, जहां आदिवासी जनजातियों ने मुख्यधारा से दूर अपनी अलग सांस्कृतिक आजादी, भाषाओं और सामाजिक-राजनीतिक ढांचों को बनाए रखा। यह इसी ढांचे को दर्शाता है।
क्या है इस गीत का मतलब?
इस गीत के ऐतिहासिक महत्व को समझने के लिए, इसके बोलों को समझना जरूरी है। इसके शब्द हमु काका बाबा ना पोरिया रे का मतलब है कि हम अपने पूर्वजों की संतान हैं। यह गीत भाईचारे और एकता की गहरी भावना को दर्शाता है। इस गीत को पारंपरिक रूप से गांवों के बीच होने वाले आयोजनों में समुदाय की ताकत, एकजुटता और आदिवासी संस्कृति को उजागर करने के लिए गाया जाता था।
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'तिमली' नृत्य से जुड़ा इतिहास
यह गाना मुख्य रूप से तिमली नृत्य और संगीत शैली का सबसे मशहूर उदाहरण है। तिमली की खासियत इसकी तेज रफ्तार और जोश भरी धुन हैं, जो पारंपरिक रूप से स्थानीय वाद्ययंत्रों से बनाई जाती हैं। इसी तरह इस गीत में भी मंडल और ढोल, पिपुड़ी यानी बांसुरी और घुंघरू की आवाज इस गीत को और भी जोशीला बनाती है। ऐतिहासिक रूप से, तिमली संगीत कहानी कहने और समुदाय को जोड़ने का एक जरिया था, जिसे अच्छी फसल के बाद या वसंत के आगमन पर किया जाता था।
भगोरिया उत्सव से जुड़ाव
यह पारंपरिक लोकगीत भगोरिया हाट से भी जुड़ा हुआ है। यह भील और भिलाला जनजातियों द्वारा होली से पहले मनाया जाने वाला एक प्राचीन कृषि उत्सव है। इस दौरान, आस-पास के कबीले स्थानीय बाजारों में इकट्ठा होकर "हमु काका बाबा ना पोरिया रे" गीत पर गोल घेरे में नाचते हुए गाते हैं; वे अपनी पुश्तैनी जड़ों का जश्न मनाते हैं।
आधुनिक दौर में वापसी और सांस्कृतिक संरक्षण
हाल के वर्षों में, यह गाना क्षेत्रीय लोक-संस्कृति से निकलकर ग्लोबल पॉप-कल्चर का हिस्सा बन गया है। वर्तमान में, "हमु काका बाबा ना पोरिया रे" सिर्फ एक स्थानीय आदिवासी गीत ही नहीं बल्कि जबरदस्त डांस ट्रैक बन गया है, जो आदिवासियों के अस्तित्व, एकता और अटूट सांस्कृतिक विरासत को भी दर्शाता है।