क्या है इम्पोस्टर सिंड्रोम, जिससे जूझ रहे थे विराट कोहली, कामयाबी के शिखर पर भी क्यों होता है खुद पर शक?
छोटी-सी भूल होने पर खुद को कोसने लगना या सफलता मिलने के बाद भी खुद को उसके लायक न समझना इम्पोस्टर सिंड्रोम का संकेत हो सकता है। ...और पढ़ें
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कैसे निकलें इम्पोस्टर सिंड्रोम से बाहर? (Picture Courtesy: Freepik)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या काम में छोटी-सी चूक होते ही आप खुद को दोष देने लगते हैं? क्या आपके मन में भी अक्सर यह विचार आता है कि आप नौकरी में अच्छा परफॉर्म नहीं कर पा रहे हैं, आप कमजोर हैं या खुद को नाकाम समझने लगते हैं? अगर तमाम सफलताओं के बावजूद आप हर वक्त खुद पर शक करते हैं, तो आप इम्पोस्टर सिंड्रोम का शिकार हो सकते हैं।
हाल ही में भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान विराट कोहली ने भी बताया कि अपने करियर की ऊंचाइयों पर होने के बावजूद वे इम्पोस्टर सिंड्रोम का सामना कर चुके हैं। इसके कारण वे इमोशनली काफी डाउन महसूस करते थे, जिससे उबरने में उनके कोच ने काफी मदद की थी।
दुनिया भर में लाखों लोग ओवरथिंकिंग की इस मानसिक स्थिति से जूझ रहे हैं और शोध बताते हैं कि यह समस्या महिलाओं और लंबे समय से हाशिए पर रहे समूहों में ज्यादा देखी जाती है। आइए समझें यह कैसे व्यक्ति को प्रभावित करती है और इससे बाहर निकलने के लिए क्या कर सकते हैं।
आत्मविश्वास को पहुंचती है चोट
लगातार खुद को अयोग्य समझने की यह आदत धीरे-धीरे इंसान के आत्मविश्वास को पूरी तरह कमजोर कर देती है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, अपनी छोटी-छोटी गलतियों के लिए खुद को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराना बेहद खतरनाक हो सकता है, लेकिन अच्छी बात यह है कि इस नेगेटिव सोच को कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी की मदद से बदला जा सकता है। सीबीटी लोगों को उनके दिमाग में चल रहे नकारात्मक विचारों को पहचानने और उन्हें चुनौती देने की कला सिखाती है।
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(AI Generated Image)
विचारों को चुनौती दें और नजरिया बदलें
एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब भी आपका मन आपसे कहे कि मैं इस नौकरी के लायक नहीं हूं, तो तुरंत रुकें और खुद से एक सवाल करें कि अगर मैं अयोग्य था, तो मुझे यह नौकरी मिली कैसे? दरअसल, ओवरथिंकिंग के जाल से बचने के लिए हमें अपनी भाषा बदलनी होगी। खुद को यह बोलने के बजाय कि मैं फेल हूं, यह कहना सीखें कि मुझसे गलती हुई है। यह छोटा-सा बदलाव आपके मानसिक बोझ को बहुत कम कर देता है।
सीबीटी कैसे है मददगार?
कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी के तहत सबसे पहले व्यक्ति को अपनी नकारात्मक सोच को पहचानना सिखाया जाता है। इसके बाद उन विचारों की असल सच्चाई की जांच की जाती है कि वे हकीकत में कितने सही हैं।
हर डर सच नहीं, यह सिर्फ एक विचार है
हमें यह समझना होगा कि मन में आने वाला हर डर सच नहीं होता, बल्कि कई बार वह सिर्फ दिमाग में उपजा एक साधारण ख्याल है। इस समस्या से निपटने के लिए आप एक अनोखा तरीका अपना सकते हैं। जब आपके मन में ऐसे नेगेटिव ख्याल आने लगें, तो उन्हें एक कागज पर लिखें और फिर उन्हें रिवर्स में पढ़ें। इससे उन विचारों की नकारात्मकता का असर धीरे-धीरे कम होने लगता है।
जरूरी है रोज मेंटल जिमिंग करना
जिस तरह शरीर को फिट रखने के लिए रोज एक्सरसाइज की जरूरत होती है, उसी तरह नेगेटिव सोच को बदलने के लिए मेंटल जिमिंग यानी लगातार मेंटल जिमिंग की जरूरत होती है। यह बदलाव रातों-रात नहीं आता। इसके लिए आपको रोज प्रैक्टिस करनी होगी। अगर आप भी इस मानसिक तनाव से बचना चाहते हैं, तो अपनी खूबियों को पहचानना शुरू करें। खुद को कोसने के बजाय अपनी काबिलियत पर भरोसा जताएं और हर छोटी गलती को खुद पर हावी न होने दें।