'सब अच्छा होगा' कहने वाले शुभचिंतक कहीं डिप्रेशन में तो नहीं धकेल रहे? समझें टॉक्सिक पॉजिटिविटी का यह खेल
मुश्किल परिस्थिति में पॉजिटिव सोच रखना जिंदगी आसान करने का तरीका है। क्या हो अगर ये पॉजिटिविटी ही टॉक्सिक बन जाए? ...और पढ़ें

पॉजिटिविटी टॉक्सिक पड़ सकती है मेंटल हेल्थ पर भारी (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हमें हर दिन कोई न कोई व्यक्ति पॉजिटिव रहने की सलाह देता है, उनके हिसाब से मुश्किल परिस्थिति में पॉजिटिव सोच रखना जिंदगी को आसान करने का तरीका है। क्या हो अगर ये पॉजिटिविटी ही टॉक्सिक बन जाए? जिन चीजों या बातों से हम दूर रहकर खुद को खुश करने की कोशिश कर रहे हैं, अगर वही टॉक्सिक हो जाए तो जिंदगी आसान नहीं बल्कि उतनी ही मुश्किल हो जाएगी। अब सवाल यह कि आखिर पॉजिटिविटी टॉक्सिक कैसे हो सकती है? आइए इन सभी बातों का जवाब जानने की कोशिश करते हैं।
पॉजिटिविटी टॉक्सिक कैसे हो सकती है?
टॉक्सिक पॉजिटिविटी का मतलब समझें तो यह तरीका हर मुश्किल से मुश्किल परिस्थिति में खुद को खुश रखने या गुड वाइब्स में रहने के लिए कहता है। इसका सीधा सा फंडा है कि अपने हर एक नेगेटिव इमोशन को अनदेखा करके सिर्फ पॉजिटिव इमोशन पर नजर रखी जाए। माना कि अच्छी मेंटल हेल्थ के लिए पॉजिटिव रहना बड़ा फायदेमंद है लेकिन अपने इमोशन को नजरअंदाज करके ऐसा करना किसी भी तरह से हेल्दी नहीं। सभी के जीवन में कभी न कभी वो मोड़ जरूर आता है, जब वह दु:ख-दर्द जैसे नेगेटिव इमोशन से गुजरता है, इस स्थिति में खुद को यह कहना कि सब ठीक है, किसी टॉक्सिसिटी से कम नहीं।
पॉजिटिविटी टॉक्सिक है, यह कैसे समझें?
जॉब छूट जाने की स्थिति में लोग आपसे कह सकते हैं कि कुछ अच्छे के लिए यह होता है, खुद को पॉजिटिव रखो। पर आपको नहीं लगता ऐसा करना खुद के उन इमोशन को बाहर न निकाल पाना है जो अंदर ही अंदर परेशान कर रहे हो?
आपके दु:ख में सामने वाले का कहना कि ऐसा मेरे साथ भी हुआ था, आपके दर्द को छोटा महसूस कराने और फिर उसपर खुद को खुश रखने की सलाह किसी भी तरह से सुपोर्ट नहीं है।
उदासी, दु:ख, दर्द या आंसू को बुरा कहकर उन्हें नकारना इमोशन को दबाने जैसा है, फिर यह आगे चलकर मेंटल हेल्थ के लिए तो कहीं से ठीक नहीं।
टॉक्सिक पॉजिटिविटी के नुकसान
टॉक्सिक पॉजिटिविटी एक जबरदस्ती का इमोशन है, जिसमें नेगेटिव इमोशन को अनदेखा किया जाता है। यह व्यक्ति में अपने ही इमोशन को लेकर शर्मिंदगी पैदा कर सकता है।
इससे व्यक्ति के उसकी इमोशन संभालने की क्षमता भी कमजोर होती है, क्योंकि इसमें अपनी भावनाओं को समझना नहीं बल्कि उन्हें नजरअंदाज करना है।