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    म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट है असली टॉनिक! सुर और ताल से बढ़ेगी बच्चों की याददाश्त और ‘लॉजिकल थिंकिंग’

    Updated: Sun, 21 Jun 2026 11:19 AM (IST)

    बचपन से ही सुरों से नाता बच्चों की स्मृति और तार्किक क्षमता को मजबूत करता है, आज विश्व संगीत दिवस पर आरती तिवारी का आलेख। ...और पढ़ें

    म्यूजिक से बढ़ती है बच्चों की लॉजिकल थिंकिंग (Image Source: AI Generated)

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बचपन से ही सुरों से नाता न सिर्फ बच्चों की स्मृति और तार्किक क्षमता को मजबूत करता है, बल्कि उन्हें बढ़ती आयु में होने वाले मानसिक विकारों से भी बचाता है। आज विश्व संगीत दिवस पर आरती तिवारी का आलेख...

    गर्भावस्था से ही माही अपनी अजन्मी संतान को प्यारी सी लोरीनुमा कविता हमेशा सुनाती थीं, जन्म के बाद जब उन्होंने वही लोरी अपने बेटे प्रथम को सुनाई तो वह अन्य लोरियों की अपेक्षा उसकी धुन में शांत होकर सो जाता था। यही तो शक्ति है संगीत की। शिशु के मन-मस्तिष्क में जब किसी अन्य बात की समझ भी विकसित नहीं होती है, वह संगीत पहचानता है। रोते बच्चे चुप हो जाते हैं, गुनगुनाते हैं या सो भी जाते हैं। 

    संगीत की यह ताकत सिर्फ यही तक सीमित नहीं है। बच्चे के दिमाग को ज्यादा तेज, तार्किक और योजनाबद्ध बनाने का रिमोट कंट्रोल संगीत के पास है। कई शोध और विभिन्न वैश्विक स्टडीज के अनुसार, संगीत सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि बच्चों के मस्तिष्क के संपूर्ण विकास के लिए अचूक टानिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सात साल की उम्र से पहले बच्चों को संगीत सिखाया जाए, तो यह उनके मानसिक विकास को नई ऊंचाई देता है। उसे दूसरों से ज्यादा केंद्रित बनाता है। प्रोटेक्ट-यूके एजिंग कोहोर्ट के शोध के अनुसार, पियानो और मुंह से बजाने वाले वाद्ययंत्रों के अभ्यास से याद्दाश्त बेहतर होती है।   

    बच्चे बन जाते हैं खास 

    शोध के अनुसार, संगीत सीखने से बच्चों की कलात्मक समझ ही नहीं बढ़ती, बल्कि उनकी योजना बनाने और तार्किक क्षमता में भारी वृद्धि होती है। कई संगीतकारों पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि उनमें किसी भी समस्या को सुलझाने की क्षमता आम लोगों से कहीं बेहतर होती है। 

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    संगीत सीखने वालों की स्मृति और तार्किक क्षमता बहुत तेज होती है। जब बच्चा कोई वाद्ययंत्र बजाना सीखता है, तो उसे सुरों, ताल और नोट्स को याद रखना पड़ता है। यह प्रक्रिया उसके दिमाग को लगातार सक्रिय रखती है। नियमित अभ्यास से मस्तिष्क का ग्रे मैटर बढ़ता है, जिसका सीधा संबंध सोचने, समझने, याद रखने और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता से होता है। 

    खुश रहने की वजह 

    इसमें कोई दोराय नहीं कि संगीत सुनने से तनाव कम होता है, लेकिन दिमाग के पूर्ण वर्कआउट के लिए बच्चे का खुद सक्रिय रूप से संगीत सीखना या कोई वाद्ययंत्र बजाना जरूरी है। गायन से भी हैप्पी हार्मोन एंडोर्फिन रिलीज होता है, जो बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को दुरुस्त रखता है। जो बच्चे सात साल की उम्र से पहले संगीत सीखना शुरू कर देते हैं, उनके दिमाग के दोनों हिस्सों को जोड़ने वाला हिस्सा (कार्पस कैलोसम) बेहतर तरीके से विकसित होता है। 

    इससे भाषा सीखने, तर्क करने और रचनात्मकता के बीच बेहतरीन तालमेल बैठता है। इस दौरान बच्चे का दिमाग ध्वनि, दृश्य और शारीरिक गतिविधियों (जैसे अंगुलियों का मूवमेंट) के बीच तालमेल बिठाता है, जो मानसिक रूप से उसे दूसरों से ज्यादा केंद्रित बनाता है। प्रोटेक्ट-यूके एजिंग कोहोर्ट के शोध के अनुसार, पियानो और मुंह से बजाने वाले वाद्ययंत्रों के अभ्यास से याद्दाश्त बेहतर होती है। 

    स्वस्थ रहता है दिमाग  

    बचपन में सीखा गया संगीत बच्चे को सिर्फ वर्तमान में ही लाभ नहीं पहुंचाता, बल्कि उम्र बढ़ने पर होने वाली मानसिक क्षति को भी धीमा कर देता है। संगीत का अभ्यास करने वाले लोगों का दिमाग वृद्धावस्था में भी स्वस्थ रहता है और उनमें अल्जाइमर या डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) का खतरा कम हो जाता है। यह ऐसा निवेश है, जिसका रिटर्न जीवनभर मिलता रहता है। यदि आप बच्चे को मानसिक रूप से मजबूत, तनावमुक्त और कुशाग्र बनाना चाहते हैं, तो उसकी हाबी लिस्ट में वीडियो गेम्स या अतिरिक्त कोचिंग क्लासेस की जगह किसी अच्छे म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट या क्लासिकल गायन को शामिल करें!

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