शुभ अवसरों की रौनक बढ़ाता है केरल का 'मंगलमकली' नृत्य, कठिन स्टेप्स के बिना भी जीत लेता है लोगों का दिल
केरल का 'मंगलमकली' नृत्य ईसाई समुदाय का एक पारंपरिक और मनमोहक लोकनृत्य है, जो शादियों व शुभ अवसरों पर सामूहिक रूप से प्रस्तुत किया जाता है।

क्या है सदियों पुराना लोकनृत्य 'मंगलमकली' (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। दक्षिण भारत के खूबसूरत राज्य केरल की संस्कृति जितनी अनूठी है, उतने ही खास हैं वहां के लोकनृत्य। इन्हीं में से एक बेहद आकर्षक और मन मोह लेने वाला पारंपरिक नृत्य है- 'मंगलमकली'।
अपनी सादगी और मधुर लोकगीतों के लिए मशहूर यह नृत्य केरल के ईसाई समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का एक बहुत अहम हिस्सा बन चुका है। आइए, इस खूबसूरत लोकनृत्य से जुड़ी कुछ खास बातें जानते हैं।
शादियों और शुभ मौकों की रौनक
मंगलमकली को मुख्य रूप से विवाह समारोहों और अन्य मांगलिक अवसरों पर बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ प्रस्तुत किया जाता है। यह एक सामूहिक नृत्य है, जिसमें पुरुष या महिलाएं एक गोल घेरा बनाते हैं और एक साथ ताल से ताल मिलाकर थिरकते हैं।
सांस्कृतिक संगम और इसका इतिहास
इस लोकनृत्य की परंपरा कोई आज की नहीं, बल्कि कई सदियों पुरानी है। मंगलमकली का जन्म केरल के पूर्वी ईसाई समुदाय के बीच हुआ था। इस समुदाय ने बड़ी ही खूबसूरती से अपनी धार्मिक परंपराओं को स्थानीय मलयाली संस्कृति के साथ पिरोया, जिसका नतीजा यह शानदार नृत्य है। यह कला मुख्य रूप से केरल के इन क्षेत्रों में बहुत प्रचलित है:
- कोट्टायम
- एर्नाकुलम
- इडुक्की
- पथानामथिट्टा
- त्रिशूर
क्या है 'मंगलमकली' का असली अर्थ?
इस नृत्य का नाम ही इसके उद्देश्य और महत्व को पूरी तरह से साफ कर देता है। 'मंगलमकली' असल में दो शब्दों के मेल से बना है:
- मंगलम: जिसका मतलब है शुभ, कल्याण या कोई अच्छा अवसर।
- कली: जिसका अर्थ होता है नृत्य या खेल।
यानी, सरल शब्दों में कहें तो मंगलमकली का सीधा सा अर्थ है- 'शुभ अवसर पर किया जाने वाला नृत्य।'
कठिन स्टेप्स नहीं, भावों और तालमेल पर है जोर
इस नृत्य की सबसे बड़ी खासियत इसका सरल होना है। इसमें नर्तकों को बहुत मुश्किल या कठिन मुद्राएं नहीं करनी होती हैं। इसके बजाय पूरा ध्यान एक सुर-ताल, सामूहिक तालमेल और भावनाओं को व्यक्त करने पर दिया जाता है।
संगीत और तालियों की गूंज
मंगलमकली बिना अपने पारंपरिक संगीत के अधूरा है। नृत्य के दौरान जो मधुर लोकगीत गाए जाते हैं, उनकी कहानियां सीधे आम जीवन से जुड़ी होती हैं। इन गीतों में पारिवारिक जीवन, शादी-ब्याह, सामाजिक परंपराओं, नैतिक मूल्यों और धार्मिक विश्वासों का सुंदर वर्णन होता है।
आमतौर पर कलाकार समूह में गाते हुए केवल अपनी तालियों की लय पर ही यह नृत्य करते हैं। हालांकि, कभी-कभार इन शुभ मौकों के उल्लास को बढ़ाने के लिए स्थानीय वाद्य यंत्रों का भी इस्तेमाल किया जाता है, जो पूरे माहौल में चार चांद लगा देते हैं।
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