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    हरियाणवी गानों पर खूब थिरके होंगे, लेकिन क्या कभी हरियाणा की असली 'रागिनी' सुनी है? दिलचस्प है इस लोकगीत की कहानी

    Updated: Sat, 08 Aug 2026 12:08 PM (GMT+05:30)

    रागिनी हरियाणा का लोकगीत है, जिसकी शुरुआत सालों पहले सांग परंपरा से हुई थी। ...और पढ़ें

    क्या है हरियाणा के मशहूर लोकगीत रागिनी की कहानी? (AI Generated Image)

    क्या है हरियाणा के मशहूर लोकगीत रागिनी की कहानी? (AI Generated Image)

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हरियाणवी गानों पर तो आपने भी खूब डांस किया होगा। ये गाने हर शादी-पार्टी में धूम मचा देते हैं, लेकिन क्या आपने कभी हरियाणा का असली लोकगीत रागिनी सुनी है? ये हरियाणा का पारंपरिक लोकगीत है। 

    सपना चौधरी का मशहूर गाना 'पतला दुपट्टा तेरा मुंह दिखे...' भी एक रागिनी ही है, लेकिन क्या आप जानते हैं इसकी शुरुआत कैसे हुई थी? आइए जानें हरियाणा की संस्कृति में रची-बसी रागिनी की कहानी।  

    सांग से शुरू हुई रागिनी

    रागिनी की शुरुआत हरियाणा की सांग परंपरा से हुई है। 19वीं और 20वीं शताब्दी में सांग खुले मंचों पर खेला जाता है। यह लोकनाट्य का एक रूप है, जिसके जरिए पौराणिक कथाएं, लोक कथाएं, समाज से जुड़े मुद्दे आदि लोगों तक पहुंचाए जाते थे। 

    इन नाटकों को मजेदार बनाने के लिए बीच-बीच में संवादों को छंद और रागों में ढाल दिए गए। सांग में ढाले गए ये संगीतमय छंद ही आगे चलकर रागिनी बने और आज भी इन्हें कहानी सुनाने या अपनी भावना जाहिर करने के लिए गाया जाता है। 

    रागिनी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में पंडित लखमीचंद का अहम योगदान है। इन्हें हरियाणा का शेक्सपियर भी कहा जाता है। उन्होंने रामायण, महाभारत जैसी पौराणिक कथाओं और ऐतिहासिक लोकगाथाओं को रागिनी में ढाला और इन्हें खूब मशहूर किया। इनके बाद और भी कई कवियों ने रागिनी गाने की परंपरा को आगे बढ़ाया। 

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    क्यों गाई जाती है रागिनी?

    पुराने समय में मनोरंजन के साधन काफी कम थे। तब रागिनी के जरिए लोगों तो पौराणिक कथाएं और ऐतिहासिक घटनाओं के बारे में सुनाया जाता था। इन गीतों के जरिए ये कहानियां आम जनता तक पहुंची। रागिनी मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों और नैतिक मूल्यों को लोगों तक पहुंचाने के लिए भी गाई जाती है। 

    कब गाई जाती है रागिनी? 

    रागिनी लगभग हर मौके पर गाई जाती है। कोई त्योहार हो, मेला, शादी-ब्याह, चौपाल की बैठक या सिर्फ मनोरंजन के लिए कवियों की बैठक, रागिनी हर अवसर की जान बनती है। रागिनी के कई कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते है, जिनमें अलग-अलग कवि मंच पर आकर अपनी लिखी रागिनी सुनाते हैं और लोगों का मनोरंजन करते हैं। 

    रागिनी की खासियत क्या है?

    रागिनी की सबसे बड़ी खासियत है कि इस हरियाणा की ठेठ बोली में गाया जाता है। इसकी यही खासियत इसे लोगों के दिलों से जोड़ती है। इसे हारमोनियम, ढोलक, मंजीरा और मटके जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों पर गाया जाता है। इन वाद्य यंत्रों की धुन पर रागिनी को धीमी गति से शुरू किया जाता है और फिर लय तेज हो जाती है।

    गायक के ऊंचे सुर और तेज गति से गाए गए छंद रागिनी को सभी लोकगीतों से अलग बनाती है। कई बार रागिनी में दो गायक आपस में गीतों के जरिए सवाल-जवाब करते हैं। इसे सवाल-जवाब रागिनी या जवाब दावा कहा जाता है। हालांकि, समय के साथ रागिनी में बदलाव आए हैं, लेकिन इसका मूल ढांचा आज भी वही है।