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    7 महीने का सफर, बारिश की रात और मल्हार राग, पढ़ें राजस्थान में कैसे लोकगीत सुन ढोला को आई थी मारू की याद

    Updated: Sat, 01 Aug 2026 01:12 PM (GMT+05:30)

    राजस्थान की ढोला-मारू लोककथा का संबंध यहां की खास कठपुतली लोक कला और मल्हार राग से है। ...और पढ़ें

    राजस्थान की ढोला-मारू लोककथा (Image Source: AI Generated)

    राजस्थान की ढोला-मारू लोककथा (Image Source: AI Generated)

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। राजस्थान का समृद्ध इतिहास ही उसकी सबसे बड़ी पहचान है, आज भी वीर योद्धाओं की बात आती है तो सबसे पहले इसी राज्य का नाम लिया जाता है। इन्हीं नामों के बीच एक नाम और यहां प्रचलित है ढोला-मारू, पर इसका संबंध किसी युद्ध से नहीं बल्कि दूसरी जंग यानी इश्क से है। हमने हीर रांझा, सोहनी-महिवाल की कहानियां तो जरूर सुनी हैं, लेकिन ढोला-मारू की कहानी बहुत कम लोग जानते हैं। 

    राजस्थान की ढोला-मारू लोककथा 

    राजस्थान में ढोला-मारू में पति या प्रेमी को प्यार से ढोला कहा जाता है, वहीं मारू पुराने समय की राजकुमारी का नाम है। कहते हैं कि एक समय पर जब बीकानेर के पूंगल नामक क्षेत्र में भयंकर अकाल पड़ा तो वहां के राजा ने अपनी डेढ़ साल की बेटी मारुवणी के साथ नरवर के राजा के यहां शरण ली। राजा नल का एक 3 साल का बेटा था जिसका नाम शाल्वकुमार था। उसी समय दोनों की शादी कर दी गई, पर इतनी कम उम्र में गौना संभव नहीं था। 

    इसके बाद राजा अपनी बेटी को लेकर पूंगल लौट गए। शाल्वकुमार जब बड़ा हुआ था तो वो अपनी यह शादी भूल गया जबकि मारुवणी उसके विरह की आग में दिन रात जलती रही। पूंगल के राजा ने कई बार संदेश भिजवाने की कोशिश की लेकिन उस समय शाल्वकुमार की दूसरी पत्नी ने यह संदेश उस तक पहुंचने नहीं दिया। 

    मल्हार राग में गाए गीत  

    मारू के ढोला तक कोई भी संदेश न पहुंचने के बाद राजा ने ढोली यानी लोकगायक को संदेशवाहक के रूप में भेजा। वह करीब 7 महीने के मुश्किल सफर के बाद एक बारिश की रात में ढोला के घर के बाहर पहुंचा। उसने मल्हार राग में ढोला मारू के विरह गीत गाए और तब जाकर शाल्वकुमार को अपना बचपन याद आया।

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    कठपुतली कला से जुड़ाव 

    आज भी यह कहानी राजस्थान में कठपुतली कला में जीवित बनी हुई है। अक्सर ढोला-मारू की कहानी को दृश्यों के रूप में कठपुतली के माध्यम से बड़ी ही खूबसूरती से पेश किया जाता है। इस तरह यह कहानी केवल ढोला मारू की प्रेम गाथा नहीं है, यह राजस्थान की लोक संस्कृति को जीवंत बनाए रखना का एक तरीका भी है। इस कहानी के माध्यम से उस समय के अकाल, पलायन और लोकगीतों के बारे में जानकारी मिलती है।