रामायण के भजन और नवाबों की बैतबाजी… दो संस्कृतियों के मेल से बनी है आज की अंताक्षरी, सदियों पुराना है इतिहास
मन न लगने पर खाली समय में अंताक्षरी तो खूब खेली होगी, आज इसका दिलचस्प इतिहास भी जान लीजिए। ...और पढ़ें

रामायण और मुगल काल से जुड़ी हुई है अंताक्षरी (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। ‘बैठे-बैठे बोर हुए करना है कुछ काम, शुरू करें अंताक्षरी लेकर प्रभु का नाम’ यह लाइन हम हर बार कहते हैं जब भी अंताक्षरी खेलेने की शुरुआत करते हैं। 90 के दशक में मशहूर शो 'अंताक्षरी' से निकली यह लाइन आज भी सबकी जुबान पर है।
यह एक ऐसा खेल है जो माहौल को कुछ मिनटों में ही रंगीन बना देता है, सबके चेहरों पर मुस्कान आ जाती है लेकिन हम इसके शुरू होने का इतिहास नहीं जानते।
कब शुरू हुई अंताक्षरी?
वैसे तो इस बात में आज भी मतभेद है कि अंताक्षरी की शुरू कहां से हुई लेकिन इसके सबसे पहले प्रमाण प्राचीन काल से मिलते हैं। संस्कृत के ‘अन्त्य’ और ‘अक्षर’ से बने अंताक्षरी का मतलब है अंतिम अक्षर का खेल, जिसका संबंध वेदिक काल से बताया जाता है।
वहीं, इसका मूल रूप रामायण में भी देखने को मिलता है जब ऋषि-मुनि समूह में भजन गाकर अंतिम अक्षर से दूसरा भजन शुरू कर देते थे। वहीं, इसे अन्त्याक्षरी इसलिए नहीं बोला जाता क्योंकि हिंदी और अन्य हिंद-आर्य भाषाओं में श्वा लोप प्रक्रिया को अपनाया जाता है, इसके चलते सबसे आखिर में आने वाली 'अ' की ध्वनि का उच्चारण नहीं करते।
बैतबाजी से भी नाता
इसके अलावा, आज का अंताक्षरी खेल उर्दू के बैतबाजी खेल से भी जोड़कर देखा जाता है। इसे उर्दू शायरों का मौखिक और बौद्धिक खेल भी कहते हैं। 1764 के आसपास के युद्धों के बाद देश में काफी लंबे समय तक कायम रही थी और इसी सुकून के बीच लोगों ने युद्ध के बजाय तरह-तरह की बाजी खेलना शुरू किया।
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सबसे पहले हाथियों, गैंडों और मेढ़ों की लड़ाई से इसकी शुरुआत हुई। इसके बाद मुर्गों और तीतरों की लड़ाई कारवाई जाने लगी, फिर पतंगबाजी आई। लोगों में जब शिक्षा का प्रचार-प्रसार होने लगा तो बैतबाजी ने सबके बीच एक खास जगह बनाई। अब जंग मैदान में नहीं बल्कि लखनऊ और दिल्ली के शाही दरबारों में मुशायरों की महफिलों में होती थी।
बैतबाजी और अंताक्षरी आपस में कैसे जुड़ी हुई है?
यह जानने के लिए हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि बैतबाजी खेलते कैसे थे। महफिल में दो टीम बनाई जाती थीं, एक टीम जब शेर पढ़ती थी और दूसरी उस शेर के आखिर का शब्द यानी अंतिम हर्फ पकड़कर दूसरा शेर कहती थी। इसी वजह से कहा जाता है कि अंताक्षरी का जन्म नवाबों के इसी शौक बैतबाजी से हुआ है।