'रांझन दे यार बुलेया...' आखिर कौन थे बुल्ले शाह, 300 साल बाद भी बॉलीवुड गानों में जिनका होता है जिक्र?
बाबा बुल्ले शाह, जिनका जन्म पंजाब में हुआ था, एक महान सूफी संत और कवि थे जिनके प्रेम के संदेश आज भी बॉलीवुड के कई गानों में गूंजते हैं। ...और पढ़ें
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'वे माहिया' गाना लिखने वाले बुल्ले शाह की कहानी (Picture Courtesy: Facebook)

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जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज जब भी सूफी म्युजिक, बॉलीवुड के लव सॉन्ग्स और कव्वालियों की बात होती है, तो उनमें बुल्ले शाह का जिक्र जरूर होता है। ये वही बुल्ले शाह हैं, जिन्होंने ‘वे माहिया तेरे वेखन नू, चुक चरखा गली दे विच पावा…’ लिखा था। ये गाना सोशल मीडिया पर भी आपने कई बार सुना होगा, लेकिन क्या इस गाने को लिखने वाले बुल्ले शाह की कहानी पता है?
गानों में मोहब्बत की मिसाल माने जाने वाले बुल्ले शाह आखिर थे कौन और क्यों बॉलीवुड के कई गानों में इनका जिक्र किया गया है? आइए जानें बाबा बुल्ले शाह की कहानी।
कौन थे बाबा बुल्ले शाह?
बाबा बुल्ले शाह का जन्म 1680 के आसपास पंजाब में हुआ था। उनका नाम सैयद अब्दुल्ला शाह कादरी थी, लेकिन लोग इन्हें बुल्ले शाह बुलाते थे। वे एक ऊंचे सैयद घराने में पैदा हुए थे और अरबी-फारसी के अच्छे जानकार थे, लेकिन उनके मन में अक्सर सवाल आता कि सबका खुदा एक है, तो लोगों में इतनी नफरत क्यों?
वे अपने खुदा को पाना चाहते थे और एक दिन उनकी मुलाकात सूफी संत शाह इनायत कादरी से हुई। कहा जाता है कि इनायत शाह एक माली थे, लेकिन उनकी सोच दुनिया से काफी अलग थी।
बाबा बुल्ले शाह ने जब उनसे पूछा कि भगवान कहां मिलेंगे, तो उन्होंने जवाब दिया कि रब तो लोगों के दिल में बसता है। उनकी ये बात बुल्ले शाह के दिल में घर कर गई और उन्होंने शाह इनायत को अपना गुरू बना लिया।
गुरु से रूठना और मनाने की कहानी
बुल्ले शाह सैयद थे और एक माली को अपना गुरू बनाना उस समय के लोगों को पसंद नहीं आई। एक माली को अपना गुरू बनाने की वजह से बुल्ले शाह को लोगों की काफी नाराजगी का सामना करना पड़ा, लेकिन वो दुनिया की परवाह किए बिना शाह इनायत के साथ अध्यात्म की राह पर चलते रहे।
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बुल्ले शाह से जुड़ी एक कहानी काफी मशहूर है। एक बार उनके गुरू उनसे किसी बात पर नाराज हो गए और उन्होंने बुल्ले शाह को खुद से दूर कर दिया। बुल्ले शाह को यह जुदाई बर्दाशत नहीं हुई और अपने गुरू को मनाने के लिए उन्होंने पैरों में घुंघरू बांधकर नाचने-गाने लगे।
कई महीनों बाद जब गुरू ने बुल्ले शाह को देखा, तो तुरंत पहचान गए और उनसे पूछा क्या तुम बुल्ला हो? तो बुल्ले शाह उनके पैरों में गिर गए और बोला नहीं, हुजूर, मैं तो आपका भुल्ला हूं। शाह इनायत खुश हो गए और अपने शिष्य को गले से लगा लिया।
कहा जाता है इसी दौरान अपने गुरू को अपना महबूब मानकर बुल्ले शाह ने कई कविताएं और सूफी कलाम लिखे, जो आज भी मशहूर हैं। इन्हीं में वे माहिया तेनू वेखन नूं भी शामिल है।
गानों में आज भी जिंदा हैं बुल्ले शाह
आज भी बॉलीवुड की फिल्में हो या वडाली ब्रदर्स के सूफी गाने हो, बुल्ले शाह का जिक्र प्रेमी का समर्पण और प्रेम दिखाने के लिए जरूर किया जाता है। सुल्तान फिल्म का गाना बुलेया की लाइन ‘मैं भी नाचूं, रिझाऊं सोने यार को, चलूं मैं तेरी राह बुलेया’ बुल्ले शाह की कहानी से प्रेरित है। इसी तरह ऐ दिल है मुश्किल का गाना ‘राझन दे यार बुलेया’ में भी बुल्ले शाह का जिक्र किया गया है।
बुल्ले शाह के लिए प्रेम ही उनका धर्म था। इसलिए आज भी किसी गाने में दीवानगी, जुदाई या इश्क का जिक्र करना होता है, तो बाबा बुल्ले शाह का नाम या उनकी शायरियों का सहारा लिया जाता है।