पुरुषों से नफरत या बराबरी की बात! आखिर क्या है Feminism, जिसे लेकर अक्सर होती है गलतफहमी?
आज भी कई लोग फेमिनिज्म के सही अर्थ को नहीं जानते हैं। हमारे आसपास लोग आसानी से खुद के फेमिनिस्ट बता देते हैं, लेकिन नहीं जानते हैं कि इसका मतलब क्या ह ...और पढ़ें

फेमिनिज्म का सही अर्थ: जानें लैंगिक समानता और नारीवाद का पूरा इतिहास (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
फेमिनिज्म का अर्थ लैंगिक समानता है, पुरुषों से नफरत नहीं
फेमिनिस्ट महिलाओं के समान अधिकारों और अवसरों में विश्वास रखते हैं
नारीवाद का इतिहास प्राचीन काल से #MeToo तक फैला है
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर लगातार एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में एक लड़की खुद को मेन हेटर बताते हुए कहती है कि फेमिनिस्ट है।
हम में कई लोग आज भी इस शब्द का यही मतलब जानते हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को ही इसका सही मतलब पता है। आज इस आर्टिकल में हम इसी के बारे में जानेंगे। आज हम आपको बताएंगे फेमिनिज्म के इतिहास और इसके असली मतलब के बारे में, जिसे आज भी कई सारे लोग अच्छे से नहीं जानते हैं।
क्या है फेमिनिज्म का मतलब?
फेमिनिज्म, जिसे हिंदी में नारीवाद भी कहा जाता है, के लिए असल में कोई आधिकारिक नियम-किताब नहीं है। यह एक ऐसा आंदोलन है, जो मुख्य रूप से जेंडर इक्वालिटी से जुड़ा हुआ है। फेमिनिज्म का मतलब है समाज में महिलाओं के लिए समानता लाना, जिससे उन्हें पुरुषों की ही तरह समान रूप से हर क्षेत्र में अवसर मिल सके। इसका मकसद सभी के लिए एक समान दुनिया बनाना है।
कौन होता है फेमिनिस्ट?
आजकल हर दूसरा व्यक्ति खुद को फेमिनिस्ट बताता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि असल में फेमिनिस्ट कौन होता है। इसका जवाब काफी सिंपल है, कोई भी वह व्यक्ति, जो इस बात को मानता है और उस पर अमल करता है कि सभी महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार और अवसर मिलने चाहिए, वह फेमिनिस्ट हो सकता है।
कैसे हुई फेमिनिज्म की शुरुआत?
सोशल मीडिया के इस दौर में अक्सर कई हैशटैग्स और मूवमेंट्स ट्रेंड होते रहते हैं, जिन्हें देख अक्सर लोगों को यह लगता है कि फेमिनिज्म आजकल का कोई मुद्दा है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि महिलाओं को पुरुषों के बराबर राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सम्मान दिलाने की यह लड़ाई हजारों सालों से चली आ रही है। प्राचीन ग्रीस की दार्शनिक बहसों से लेकर ग्लोबल #MeToo मूवमेंट तक, फेमिनिज्म के इतिहास का एक दिलचस्प सफर रहा है।
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समानता के लिए शुरुआती आवाजें
पुरुषों और महिलाओं की बराबरी वाली यह सोच कोई नई बात नहीं है। प्राचीन ग्रीस में भी, दार्शनिक प्लेटो ने तर्क दिया था कि समाज को चलाने और उसकी रक्षा करने के लिए महिलाओं में भी पुरुषों जैसी ही स्वाभाविक क्षमताएं होती हैं। बेशक, हर कोई इससे सहमत नहीं था और इसी ने जन्म दिया फेमिनिज्म की विचारधारा को।
मध्य युग और एनलाइटनमेंट के दौर में, क्रिस्टीन डी पिजान और मैरी वोलस्टोनक्राफ्ट जैसी महिलाओं ने अपनी लेखनी के जरिए महिलाओं के प्रति गहरी नफरत यानी मिसोजिनी के खिलाफ लड़ाई शुरू की।
पहली लहर: वोटिंग और आजादी की मांग
19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में महिलाओं के अधिरकार के लिए विद्रोह आकार लेने लगा। गुलामी खत्म करने के लिए लड़ रही महिलाओं को इस कड़वी सच्चाई का एहसास होने लगा कि वे ऐसे अधिकारों की वकालत कर रही थीं, जो उनके पास खुद नहीं थे। इस तरह शुरुआत हुई फेमिनिज्म की पहली लहर की, जिसमें महिलाओं के बुनियादी अधिकारों, खासकर वोट देने के अधिकार को हासिल करने पर बहुत जोर दिया गया। आखिरकार
दूसरी लहर: आजादी और काम की जगह
जैसे-जैसे समय बीतता गया, बराबरी के लिए उठने वाली मांगे भी बदलती गई। वोटिंग का अधिकार मिलने के बाद बारी आई फेमिनिज्म की दूसरी लहर की, जिसे "महिला मुक्ति" यानी वुमन लिबरेशन कहा गया। इस दौर में बेट्टी फ्रीडन और ग्लोरिया स्टीनम जैसी नेताओं ने यह तर्क दिया कि महिलाएं सिर्फ वोट देने के अधिकार से कहीं ज्यादा की हकदार हैं; उन्हें समान वेतन, काम की जगह पर समान अवसर और घरेलू कामों से हटकर अपनी राह चुनने का अधिकार मिलना चाहिए।
तीसरी लहर: मौजूदा हालात में महिलाओं के हक की लड़ाई
1990 के दशक तक, एक नारीवाद को लेकर एक "तीसरी लहर" सामने आई, जिसने अश्वेत महिलाओं, LGBTQ+ समुदाय और धार्मिक अल्पसंख्यकों के हक के लिए आवाज उठाई। वर्तमान में भी यह लड़ाई लगातार आगे बढ़ रही है। #MeToo जैसे आंदोलन के बाद यौन उत्पीड़न और सहमति जैसे मुद्दों पर दुनिया भर का ध्यान गया। फेमिनिज्म कोई ऐतिहासिल घटना नहीं, बल्कि एक ऐसे समाज की कल्पना है, जहां सभी को बराबरी से रहने का हक मिले।