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    विदाई से पहले मायके में बेटी का आखिरी भोजन... बेहद खास होती है बंगाली शादियों की 'आई बुढ़ों भात' रस्म

    Updated: Mon, 04 May 2026 02:12 PM (IST)

    बंगाली संस्कृति में शादी से पहले आई बुढ़ों भात की रस्म निभाई जाती है। इस रस्म का सांस्कृतिक और भावनात्मक महत्व है। ...और पढ़ें

    क्या है आई बुढ़ों भात की रसम? (AI Generated Image)

    क्या है आई बुढ़ों भात की रसम? (AI Generated Image)

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। शंख की गूंज और हवा में स्वादिष्ट पकवानों की महक,  बंगाली शादियों की बात ही कुछ और होती है! अपनी परंपराओं और अनूठी रस्मों के लिए मशहूर बंगाली शादियों में हर एक पल बेहद खास होता है। ऐसी ही एक खूबसूरत और दिल को छू लेने वाली रस्म है आई बुड़ो भात। 

    यह शादी से पहले होने वाली एक रस्म है, जो हर लड़की के लिए बेहद इमोशनल और खास होती है। यह रस्म खाने से जुड़ी है, जो इसे और भी खास बना देती है, क्योंकि इसमें कई पारंपरिक बंगाली व्यंजन बनाए जाते हैं। 

    आई बूढ़ों भात का मतलब क्या है?

    आई बूढ़ों भात शब्द दो शब्दों के मेल से बना है। बंगाली भाषा में आई बूढ़ों का मतलब होता है कुंवारा या अविवाहित और भात का मतलब है चावल। इन दो शब्दों को जोड़कर बनता है आई बूढ़ों भात, जिसका मतलब है शादी से पहले कुंवारी कन्या का मायके में आखिरी भोजन। इसके बाद अगला भोजन वह विवाहित स्त्री के रूप में करेगी। 

    Aai budo bhaat (1)

    (AI Generated Image)

    आई बूढ़ों भात की थाली

    आई बूढ़ों भात की थाली देखने में जितनी आकर्षक होती है, खाने में उतनी ही स्वादिष्ट। इस दिन घर में उत्सव का माहौल होता है और परिवार के सदस्य बड़े चाव से दुल्हन की पसंद के पकवान तैयार करते हैं। पारंपरिक थाली में कई शाकाहारी और मांसहारी व्यंजन शामिल किए जाते हैं, जैसे- गोबिंदोभोग चावल और घी, पांच प्रकार की तली हुई सब्जियां, माछ, लुची, छोलार दाल, रसगुल्ला और मिष्टी दोई। खाने को कांसे की थाली में सजाया जाता है और आस-पास फूलों व सुंदर अल्पना से सजावट की जाती है।

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    आई बूढ़ों भात का महत्व

    • मायके की ममता का प्रतीक- यह रस्म बेटी के लिए माता-पिता के प्रेम को दर्शाती है। वे अपनी बेटी को उसके पसंदीदा व्यंजन खिलाकर यह संदेश देते हैं कि विवाह के बाद भी वह उनके दिल में रहेगी।
    • जीवन के नए अध्याय की शुरुआत- आई बूढ़ों भात एक ट्रांजिशन यानी बदलाव का प्रतीक है। यह कुंवारेपन की विदाई और गृहस्थ जीवन की ओर बढ़ते कदम का उत्सव है।
    • पारिवार का साथ- इस अवसर पर रिश्तेदार और करीबी दोस्त शामिल होते हैं। सभी मिलकर उपहार देते हैं और होने वाली दुल्हन को सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद देते हैं। यह हंसी-मजाक और खुशियों का पल होता है।