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रेल की पटरियों के बीच क्यों बिछाए जाते हैं नुकीले पत्थर? ट्रेन की सुरक्षा से जुड़ी है इसकी असली वजह

Updated: Tue, 18 Aug 2026 11:51 AM (GMT+05:30)

रेलवे ट्रैक पर बिछे पत्थर, जिन्हें ट्रैक बैलास्ट कहते हैं, ट्रेन के भारी वजन को बांटते हैं और पटरियों को खिसकने से रोकते हैं।

सुरक्षा के लिए जरूरी हैं रेलवे ट्रैक के पत्थर (Picture Courtesy: Freepik)

सुरक्षा के लिए जरूरी हैं रेलवे ट्रैक के पत्थर (Picture Courtesy: Freepik)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आपने ट्रेन से सफर जरूर किया होगा, लेकिन क्या आपने कभी उसकी पटरियों पर गौर किया है? ट्रेन की पटरियों के बीच और आसपास ढेर सारे छोटे-छोटे आड़े-टेढ़े पत्थर बिछे होते हैं। इन पत्थरों को ट्रैक बैलास्ट कहा जाता है। 

कई लोग समझते हैं कि ये सिर्फ जमीन ढकने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, लेकिन ये पत्थर सुरक्षा के लिहाज से काफी जरूरी होते हैं। आइए जानें रेलवे ट्रैक के बीच पत्थर क्यों बिछाए जाते हैं। 

पटरियों के बीच पत्थर क्यों बिछाए जाते हैं?

  • वजन को बांटना- एक ट्रेन का वजन हजारों टन तक होता है। जब ट्रेन तेज रफ्तार से गुजरती है, तो स्टील की पटरियां और कंक्रीट के स्लीपर्स अकेले उस दबाव को नहीं सह सकते। ये पत्थर उस दबाव को सोखकर जमीन पर बराबर फैलाते हैं, जिससे पटरियां अंदर नहीं धंसतीं। 
  • पटरियों को खिसकने न देना- ट्रेन के गुजरते समय बहुत कंपन पैदा होता है। अगर केवल समतल जमीन हो, तो स्लीपर्स अपनी जगह से खिसक जाएंगे। इसलिए बैलास्ट के लिए हमेशा नुकीले और खुरदुरे पत्थरों का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि ये पटरियों को बांधकर रखें और खिसकने न दें।
  • ट्रैक से पानी सोखना- बारिश के मौसम में पटरियों के पास पानी जमा हो जाए, तो पटरियां कीचड़ में धंस सकती हैं। इसलिए पटरियों के बीच के पानी को तुरंत पानी निकालने के लिए बैलास्ट बिछाए जाते हैं। ये पत्थर ट्रैक के पास पानी जमा नहीं होने देते। 
  • घास उगने से रोकना- अगर पटरियों के आस-पास की मिट्टी खुली रहे, तो वहां घास और झाड़ियां उग आएंगी। इससे ट्रैक घास में छिप जाएंगे और पटरी बदलने या एक ट्रैक से दूसरे ट्रैक पर जाने में ड्राइवर को परेशानी हो सकती है। इसलिए पटरियों के बीच और आस-पास पत्थर बिछाए जाते हैं, जो घास और झाड़ियों को उगने से रोकते हैं। 
  • ट्रेन का शोर कम करना- ट्रेन तब तेजी से पटरियों से गुजरती है, तो पटरियों में बहुत तेज वाइब्रेशन और आवाज पैदा होती है। पत्थरों की ये परत एक शॉक अब्जॉर्बर की तरह काम करती है और वाइब्रेशन के साथ-साथ आवाज को भी सोख लेती है। इससे ट्रेन चलते समय शोर कम होता है।  

खुरदुरे पत्थरों का ही इस्तेमाल क्यों होता है?

दरअसल, गोल पत्थर आसानी से एक-दूसरे के ऊपर फिसल सकते हैं, जिससे स्लीपर्स अपनी जगह से खिसक सकते हैं। इसलिए हमेशा नुकीले और खुरदुरे पत्थरों का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि वे आसानी से एक जगह से खिसके नहीं।