बिहार के लोक नृत्य 'लौंडा डांस' की कैसे हुई शुरुआत? महिलाओं की तरह सज-संवरकर पुरुष करते हैं दमदार डांस
लौंडा नाच बिहार का मशहूर लोक नृत्य है, जिसमें पुरुष महिलाओं का भेष लेकर डांस करते हैं। ...और पढ़ें
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बिहार के लोक नृत्य लौंडा नाच की शुरुआत कैसे हुई? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार में एक ऐसा डांस किया जाता है, जिसमें पुरुष महिलाओं की तरह तैयार होते हैं और गानों पर जोरदार डांस करते हैं। इसे लौंडा नाच कहा जाता है। यह बिहार में काफी मशहूर है और कई सालों से वहां की संस्कृति का हिस्सा है।
लौंडा नाच की शुरुआत के पीछे काफी दिलचस्प कहानी है। आज भले ही इस डांस को अश्लीलता से जोड़कर देखते हैं, लेकिन इसकी शुरुआत बहुत ही अलग वजह से हुई थी। आइए जानें लौंडा नाच की शुरुआत कैसी हुई।
कैसे शुरू हुआ लौंडा नाच?
लौंडा नाच बिहार के भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में सबसे पहले शुरू हुआ। माना जाता है कि इसकी शुरुआत मुगल साम्राज्य के समय हुई थी। दरअसल, उस समय पर्दा-प्रथा काफी चलन में था। इसलिए महिलाएं सार्वजनिक जगहों या मंचों पर आकर नृत्य या अभिनय नहीं कर सकती थीं। हालांकि, उस समय बाई-जी नाच जरूर चलन में था, जिसे महिलाएं करती थी, वो भी सिर्फ उच्च वर्ग के लोगों, जैसे राजा-महाराजाओं के सामने। इसमें भी वे सिर्फ महल के अंदर सभाओं में डांस कर सकती थीं, लेकिन सावर्जनिक जगहों पर नहीं।
ऐसे में बाकी की जनता के मनोरंजन के लिए पुरुष कलाकारों ने महिलाओं का रूप लेकर नाचना शुरू किया। पुरुषों के इस स्वांग रचकर किए जाने वाले डांस को ही लौंडा नाच का नाम मिला और इसमें डांस करने वाले पुरुषों को लवंडा कहते हैं।
धीरे-धीरे ये हर शुभ अवसर पर किया जाने लगा, खासकर शादी-विवाह और मुंडन जैसे सामाजिक उत्सवों में। हालांकि, शुरुआत में ये सिर्फ डांस था, लेकिन बाद में इसमें अभिनय भी जोड़ा गया, डायलॉग्स आए, जिन्होंने लौंडा डांस को और भी मजेदार बना दिया।
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लौंडा नाच और भिखारी ठाकुर
लौंडा नाच को पहचान और सम्मान दिलवाने में भोजपुरी के शेक्सपियर कहलाने वाले भिखारी ठाकुर का अहम योगदान है। उन्होंने इस नाच को सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रखा। लौंडा नाच के जरिए भिखारी ठाकुर ने समाज की कई समस्याओं, जैसे- महिलाओं के साथ भेदभाव, शराब, गरीबी, दहेज प्रथा, प्रवासी मजदूरों की परेशानियों जैसे कई मुद्दों को लौंडा नाच के जरिए जनता तक पहुंचाया।
भिखारी ठाकुर के लिखे बिदेसिया, बेटी-बेचवा और गबरघिचोर जैसे नाटकों में समाज की कुप्रथाओं को लौंडा नाच के जरिए लोगों तक पहुंचाया गया है। भिखारी ठाकुर के साथ-साथ रामचंद्र मांझी जैसे कलाकारों ने भी लौंडा नाच को सम्मान दिलवाने में काफी अहम योगदान निभाया है।
कैसे किया जाता है लौंडा नाच?
लौंडा नाच में पारंपरा और आधुनिकता का अनोखा मेल देखने को मिलता है। इसमें पुरुष कलाकार खुद को पूरी तरह महिलाओं की तरह सजाते हैं। लहंगा-चोली या कोई भड़कीली साड़ी के साथ बहुत हैवी मेकअप किया जाता है, हाथों में चूड़ियां, पैरों में घुंघरू और नकली बाल लगाकर वे महिलाओं का रूप लेते हैं।
इस नाच में हारमोनियम, ढोलक और झाल जैसे वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है। घुंघरू की छनक और गीतों के बोल पर कलाकार बहुत ही एनर्जी के साथ डांस करते हैं। इस डांस की पहचान है इसमें किया जाने वाला एक खास स्टेप। ढोलक की थाप पर पुरुष कलाकार ताली बजाते हैं और कूदकर डांस करते हैं। इस दौरान उनके शरीर की लचक देखने को मिलती है।
इसमें सिर्फ डांस नहीं होता, बल्कि बीच-बीच दर्शकों को डायलॉग सुनाए जाते हैं, चुटकुले सुनाते हैं और समाज से जुड़े मुद्दों पर व्यंग भी कसते हैं।