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    पुराने घरों के बीच आंगन होना क्यों जरूरी माना जाता था? परंपरा के अलावा छिपे हैं और भी कई कारण

    Updated: Sat, 27 Jun 2026 09:37 AM (IST)

    पुराने समय के घरों में आंगन होना बेहद जरूरी माना जाता था। घर का ये खुला हिस्सा एक नहीं, बल्कि कई कारणों से अहम माना जाता था। ...और पढ़ें

    दादी-नानी के घरों में क्यों होते थे आंगन? (AI Generated Image)

    दादी-नानी के घरों में क्यों होते थे आंगन? (AI Generated Image)

    HighLights

    1. वेंटिलेशन और प्राकृतिक रोशनी का संतुलन बनाए रखता था

    2. पारिवारिक और सामाजिक जुड़ाव का महत्वपूर्ण केंद्र था

    3. महिलाओं की निजता और प्रकृति से जोड़ता था घर को

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज के समय में शायद ही किसी घर में आंगन देखने को मिले, लेकिन हमारी दादी-नानी और उनके पहले की पीढ़ी के समय में हर घर में आंगन होते थे। पहले आंगन घरों का सबसे अहम हिस्सा हुआ करता था। हालांकि, अब घरों से आंगन गायब हो गए हैं।  

    गांवों में भी अब आंगन धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि पुराने समय में घर में आंगन होना इतना जरूरी क्यों था? उत्तर भारत का आंगन हो या केरल का नाडुमुत्तम, हमारी पुरानी पीढ़ी ने बहुत सोच-समझकर घर में ये खुली जगह बनाई थी। आइए जानें क्यों पुराने घरों में आंगन होना जरूरी माना जाता था? 

    वेंटिलेशन और प्राकृतिक रोशनी

    आंगन बनाने का सबसे बड़ा कारण घर में हवा और रोशनी का सही बैलेंस बनाने के लिए था। उस जमाने में 24 घंटे बिजली नहीं हुआ करती थी। इसलिए रोशनी और हवा के लिए आंगन बनाए जाते थे। आंगन एक नेचुरल थर्मल रेगुलेटर का काम भी करता था। आंगन में कई लोग छोटे-मोटे पौधे आदि भी लगाते थे, जिससे घर के अंदर का वातावरण ठंडा रहता था और दिनभर घर में खूब रोशनी भी आती थी।

    Courtyard

    (AI Generated Image)

    सामाजिक और पारिवारिक जुड़ाव 

    पुराने समय में ज्यादातर लोग जॉइन्ट फैमिली में ही रहते थे। ऐसे में आंगन पूरे परिवार को आपस में जोड़ने का काम करता था। दोपहर के समय घर की महिलाएं चटाई बिछाकर आंगन में बैठती, बातें करतीं, रात के खाने की तैयारी करना, पापड़-अचार सुखाना और सब्जी आदि काटने का काम भी आंगन में करती थीं। 

    खबरें और भी

    रात के समय लोग साथ बैठकर बातें करतें, दादी बच्चों को कहानी सुनाती या गर्मी के दिनों में ठंडक पाने के लिए भी लोग आंगन में बैठा करते थे। इसके अलावा, परिवार में होने वाले शादी-ब्याह, मुंडन या त्योहार भी इसी आंगन में मनाए जाते थे। गांव समाज की महिलाएं आंगन में इकट्ठा होतीं और उत्सव मनाया जाता था।   

    धार्मिक महत्व

    लगभग हर हिंदू घर के आंगन के बीचों तुलसी का पौधा लगा होता था, जिसकी सुबह-शाम पूजा करना, दीया जलाना और आंगन में गाय के गोबर या मिट्टी से लीपना काफी शुभ माना जाता है।

    प्रकृति से कनेक्शन

    आंगन होने से घर बंद-बंद महसूस नहीं होता था। घर के अंदर से भी लोग खुले आसमान, बारिश की बूंदें और रात में तारें देख सकते थे। पक्षियों का आंगन में आकर दाना चुगना और पेड़ों की ठंडी हवा प्रकृति के करीब होने का एहसास करवाती थी। 

    महिलाओं की प्राइवेसी

    पुराने समय में महिलाएं पर्दे में रहती थीं। ऐसे में आंगन उनके लिए एक अपने प्राइवेट स्पेस जैसा होता था, जहां वे बाहरी ताक-झांक के बिना आराम से अपने काम कर सकतीं और घूम-फिर सकती थीं।