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    प्रमोशन या छंटनी जैसे फैसले भी अब AI से पूछकर ले रहे बॉस, नई स्टडी में चौंकाने वाले खुलासे

    Updated: Tue, 10 Mar 2026 03:12 PM (IST)

    एक नई स्टडी में खुलासा हुआ है कि बिजनेस लीडर्स अपने फैसलों के लिए AI पर निर्भर हो रहे हैं। ...और पढ़ें

    खुद से ज्यादा AI की सलाह पर यकीन कर रहे हैं बिजनेस लीडर्स (Image Source: AI-Generated)

    खुद से ज्यादा AI की सलाह पर यकीन कर रहे हैं बिजनेस लीडर्स (Image Source: AI-Generated) 

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    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आजकल हर तरफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की चर्चा है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह हमारी सोचने-समझने की क्षमता को कैसे बदल रहा है? एक नई स्टडी में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। ब्रिटेन के बड़े बिजनेस एग्जीक्यूटिव अब अपनी सोच और फैसले लेने की क्षमता एआई चैटबॉट्स के भरोसे छोड़ रहे हैं। हालत यह हो गई है कि जब उनके खुद के विचार एआई से अलग होते हैं, तो वे अपने ही दिमाग पर शक करने लगते हैं।

    46% बॉस को इंसानों से ज्यादा AI पर भरोसा

    मार्केट रिसर्च एजेंसी '3-जेम ने 200 कंपनी मालिकों, फाउंडर्स, सीईओ और अन्य सीनियर लीडर्स पर एक स्टडी की। इस स्टडी के जो आंकड़े सामने आए, वे हैरान करने वाले हैं:

    Cognitive Debt

    (Image Source: AI-Generated) 

    62% लीडर्स अपने ज्यादातर व्यापारिक फैसले लेने के लिए पूरी तरह से AI का इस्तेमाल कर रहे हैं।

    • अपने ही विचारों पर शक: सर्वे में शामिल 140 लोगों ने यह माना कि अगर उनका कोई आइडिया एआई की सिफारिशों से नहीं मिलता, तो वे खुद के विचारों पर शक करने लगते हैं।
    • इंसानों से ज्यादा मशीन पर भरोसा: 46% लीडर्स का कहना है कि अब वे अपने साथ काम करने वाले इंसानी साथियों की तुलना में एआई की सलाह पर कहीं ज्यादा भरोसा करते हैं।

    हैरानी की बात यह भी है कि कर्मचारी को नौकरी से निकालने यानी टर्मिनेशन जैसे गंभीर फैसलों में भी एआई का दखल बढ़ गया है। पिछले साल की एक रिपोर्ट के मुताबिक 64% बिजनेस लीडर्स ऐसे मामलों में एआई से सलाह लेते थे। वहीं, 3-जेम के 2025 के लिए किए गए सर्वे में 27% लोगों ने माना है कि वे इस तरह के बड़े फैसलों में एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं।

    'दिमागी सुस्ती' का शिकार हो रहे हैं लोग

    क्या मशीन पर इस हद तक निर्भर होना सही है? डेनमार्क के जाने-माने मनोचिकित्सक सोरेन ओस्टरगार्ड ने इसे लेकर एक बड़ी चेतावनी दी है। उनका कहना है कि एआई पर अत्यधिक निर्भरता की वजह से विद्वानों में 'कॉग्निटिव डेट' यानी दिमागी सुस्ती बढ़ सकती है।

    कार्नेगी मेलन और माइक्रोसॉफ्ट की एक साझा स्टडी भी इसी बात की पुष्टि करती है:

    • एआई पर ज्यादा निर्भर रहने से इंसानों की किसी विषय पर गहराई से सोचने की शक्ति घट रही है।
    • विशेषज्ञों का मानना है कि जब हमें यह लगने लगता है कि कोई काम मशीन बेहतर तरीके से कर सकती है, तो हमारा दिमाग खुद से कोशिश करना छोड़ देता है।
    • यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे एक सेल्फ-ड्राइविंग कार में बैठा ड्राइवर सड़क से पूरी तरह ध्यान हटा लेता है और सिस्टम के भरोसे निश्चिंत होकर बैठ जाता है।

    AI Helping kids

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    (Image Source: AI-Generated)

    बच्चों और युवाओं के मानसिक विकास के लिए घातक

    एआई का यह असर सिर्फ दफ्तरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी आने वाली पीढ़ी को भी खोखला कर रहा है। एमआईटी की एक रिसर्च के अनुसार, 'चैटजीपीटी' युवाओं की क्रिटिकल थिंकिंग को पूरी तरह से खत्म कर रहा है।

    रिसर्च में पाया गया कि जो लोग हर जवाब के लिए एआई पर निर्भर हैं, उनके दिमाग की सक्रियता उन लोगों से काफी कम पाई गई जो किसी भी जानकारी के लिए खुद 'गूगल सर्च' करते हैं। इसी संदर्भ में जानी-मानी लेखिका नतालिया कॉस्मिना ने आगाह किया है कि जिन बच्चों का दिमागी विकास अभी हो रहा है, उनके लिए AI सबसे ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। यह बच्चों की नई चीजें सीखने की क्षमता और उनके दीर्घकालिक मानसिक विकास को बहुत भारी नुकसान पहुंचा सकता है।

    Reference:

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