Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    3,389 फीट की ऊंचाई और कई राजवंशों के शासन का गवाह: किन वजहों से खास है पुणे का 'लोहगढ़ किला'?

    Updated: Thu, 25 Jun 2026 07:00 PM (IST)

    हाल ही में लोहगढ़ किले में केतन अग्रवाल की मौत की खबर ने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस घटना के बाद से यह ऐतिहासिक जगह अचानक चर्चा का विषय बन ग ...और पढ़ें

    केतन अग्रवाल मर्डर केस के बाद सुर्खियों में आया 'लोहगढ़ किला' (Image Source: Pinterest)

    केतन अग्रवाल मर्डर केस के बाद सुर्खियों में आया 'लोहगढ़ किला' (Image Source: Pinterest)

    timer icon

    समय कम है?

    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। लोहगढ़ किले में केतन अग्रवाल की दुर्भाग्यपूर्ण मौत की घटना के बाद, यह ऐतिहासिक जगह अचानक चर्चा का केंद्र बन गई है। हर कोई इस रहस्यमयी किले के बारे में जानना चाहता है।

    अगर आप भी इतिहास में दिलचस्पी रखते हैं या एडवेंचर लवर हैं, तो आइए जान लीजिए हैं महाराष्ट्र की शान लोहगढ़ किले (Lohagad Fort) से जुड़ी कुछ हैरान कर देने वाली बातें।

    Lohagad Fort images

    (Image Source: India Cine Hub)

    बादलों से बातें करता 'आयरन फोर्ट'

    महाराष्ट्र की खूबसूरत सह्याद्री पर्वतमाला के बीच बसा लोहगढ़ किला भारत के ऐतिहासिक गौरव का एक जीता-जागता सबूत है। समुद्र तल से 3,389 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस किले को Iron Fort भी कहा जाता है। सदियों पुराना इसका इतिहास और अद्भुत वास्तुकला आज भी पर्यटकों और ट्रैकर्स को अपनी ओर खींचती है।

    कई साम्राज्यों का रह चुका है गवाह

    लोहगढ़ किले का इतिहास बेहद गहरा और कई राजवंशों से जुड़ा है। इसे सबसे पहले 10वीं शताब्दी में 'लोहतमिया राजवंश' द्वारा बनाया गया था। इसके बाद समय-समय पर इस किले पर चालुक्य, राष्ट्रकूट, यादव, बहमनी, निजाम, मुगल और मराठा शासकों ने राज किया।

    • शिवाजी महाराज का दौर: साल 1648 ई. में महान छत्रपति शिवाजी महाराज ने इस किले की रणनीतिक अहमियत को समझते हुए इस पर कब्जा कर लिया। हालांकि, 1665 की 'पुरंदर की संधि' के तहत उन्हें इसे मुगलों को सौंपना पड़ा, लेकिन 1670 ई. में शिवाजी महाराज ने इसे दोबारा जीत लिया और अपने सफल सूरत अभियान से लाए गए खजाने को सुरक्षित रखने के लिए इसका इस्तेमाल किया।
    • पेशवा काल: बाद में पेशवा काल के दौरान मशहूर राजनेता नाना फडणवीस ने यहां शरण ली थी। उन्होंने किले में पानी का एक बड़ा टैंक और एक बावड़ी बनवाई थी, जो आज भी मौजूद हैं।

    जैन धर्म से भी है कनेक्शन

    सितंबर 2019 में पुणे के ट्रैकर्स के एक समूह ने किले के दक्षिणी हिस्से की एक गुफा में जैन ब्राह्मी लिपि में लिखा एक शिलालेख खोजा था। यह दूसरी या पहली शताब्दी ईसा पूर्व का है, जिससे पता चलता है कि यह गुफा कभी जैन धर्म का एक पवित्र स्थान हुआ करती थी।

    अद्भुत है किले की वास्तुकला

    इस किले की बनावट और सैन्य डिजाइन बेजोड़ है। किले में चार भव्य प्रवेश द्वार हैं- गणेश दरवाजा, नारायण दरवाजा, हनुमान दरवाजा और महा दरवाजा। ये सभी आज भी काफी हद तक सुरक्षित हैं और इन पर की गई शानदार नक्काशी पुराने समय के बेहतरीन इंजीनियरिंग कौशल को दर्शाती है।

    खबरें और भी

    किले का सबसे रोमांचक हिस्सा 'Vinchu Kada' है, जिसका मतलब होता है 'बिच्छू की पूंछ'। यह प्राकृतिक रूप से बनी एक लंबी और संकरी चट्टान है जो किले के मुख्य हिस्से से बाहर की ओर निकली हुई है और बिल्कुल बिच्छू के डंक जैसी दिखती है। यहां से सह्याद्री की पहाड़ियों का नजारा बेहद मनमोहक लगता है।

    lohagad fort

    (Image Source: Pinterest)

    ट्रैकिंग के लिए ज्यादा चलने की जरूरत नहीं

    लोहगढ़ की चढ़ाई रोमांचक होने के साथ-साथ काफी आसान भी है।

    • इसका सबसे आसान रास्ता मलावली रेलवे स्टेशन से शुरू होता है, जो करीब 10 किलोमीटर दूर है। 2 से 3 घंटे की इस ट्रैकिंग के दौरान रास्ते में प्राचीन 'भाजा गुफाएं' भी पड़ती हैं।
    • अगर आप ज्यादा चलना नहीं चाहते, तो लोहगढ़वाड़ी गांव से किले के बेस तक एक सड़क भी जाती है, जो साल भर चालू रहती है।

    क्या है घूमने का सबसे सही समय?

    • अक्टूबर से मार्च: यह किले की सैर के लिए सबसे अच्छा समय है। इस दौरान मौसम ठंडा और सुहावना होता है, और मानसून के बाद पूरी घाटी हरी-भरी हो जाती है।
    • जून से सितंबर: बारिश के मौसम में यहां झरने बहने लगते हैं और हरियाली देखते ही बनती है। हालांकि, रास्ते थोड़े फिसलन भरे हो सकते हैं, इसलिए ट्रैकर्स को सावधानी बरतनी चाहिए।
    • अप्रैल से मई: इस समय यहां काफी गर्मी और उमस होती है। अगर आप गर्मियों में जा रहे हैं, तो दोपहर की तेज धूप से बचने के लिए सुबह जल्दी या देर शाम को जाना बेहतर रहेगा।

    ध्यान रहे, सुबह जल्दी या देर दोपहर में किले पर जाने से आप सूर्योदय और सूर्यास्त के अद्भुत और सुनहरे नजारों का लुत्फ उठा सकते हैं और भीड़ से भी बच सकते हैं।

    कैसे पहुंचें लोहगढ़?

    मुंबई और पुणे से लोहगढ़ पहुंचना बहुत आसान है:

    • सड़क मार्ग: यह मुंबई से करीब 100 किमी और पुणे से 60 किमी दूर है। आप मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के जरिए लोनावला होते हुए बेस विलेज 'मलावली' पहुंच सकते हैं। लोनावला से ऑटो-रिक्शा और प्राइवेट टैक्सी आसानी से मिल जाती हैं।
    • रेल मार्ग: सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन 'मलावली' है, जो किले से सिर्फ 5 किमी दूर है। वहीं 'लोनावला रेलवे स्टेशन' यहां से 10 किमी दूर है। आप लोनावला से मलावली के लिए लोकल ट्रेन ले सकते हैं। मलावली से किले तक का 5 किमी का रास्ता बेहद खूबसूरत है।
    • हवाई मार्ग: पुणे इंटरनेशनल एयरपोर्ट और मुंबई का छत्रपति शिवाजी इंटरनेशनल एयरपोर्ट सबसे नजदीकी हवाई अड्डे हैं।

    Source: Department of Tourism Maharashtra

    यह भी पढ़ें- दिल्ली का वो ऐतिहासिक किला, जहां 'जिन्नों' को खत लिखकर मांगी जाती है मुराद; वास्तुकला का है शानदार नमूना

    यह भी पढ़ें- क्यों इतिहास के पन्नों में 'अधूरा ख्वाब' बनकर रह गया तुगलकाबाद किला? सूफी संत से जुड़ी है कहानी