Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    'बुलडोजर एक्शन पर पूर्ण रोक नहीं', अवैध निर्माणों को लेकर सुप्रीम कोर्ट टिप्पणी

    Updated: Fri, 17 Jul 2026 12:07 PM (IST)

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नवंबर 2024 का उसका फैसला अवैध निर्माणों को पूर्ण सुरक्षा नहीं देता, लेकिन ध्वस्तीकरण से पहले कारण बताओ नोटिस और 15 दिन ...और पढ़ें

    अवैध निर्माणों को लेकर सुप्रीम कोर्ट टिप्पणी (फाइल फोटो)

    अवैध निर्माणों को लेकर सुप्रीम कोर्ट टिप्पणी (फाइल फोटो)

    HighLights

    1. अवैध निर्माणों को बुलडोजर कार्रवाई से पूर्ण सुरक्षा नहीं।

    2. ध्वस्तीकरण से पहले 15 दिन का नोटिस देना अनिवार्य।

    3. अवमानना याचिकाओं पर हाई कोर्ट करेंगे सुनवाई।

    एएनआई, नई दिल्ली। पूरे देश में बुलडोजर से संपत्तियां गिराने के दिशानिर्देश निर्धारित करने वाले नवंबर, 2024 के अपने फैसले के कथित उल्लंघन को लेकर दायर अवमानना याचिकाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को हाई कोर्टों से कहा कि इन पर वे निर्णय करें।

    13 नवंबर, 2024 के इस फैसले में कहा गया था कि पहले से कारण बताओ नोटिस दिए बिना कोई भी संपत्ति नहीं गिराई जानी चाहिए और प्रभावित लोगों को जवाब देने के लिए 15 दिन का समय दिया जाना चाहिए। साथ ही इसमें कई और निर्देश दिए थे।

    प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने उन अवमानना याचिकाओं पर सुनवाई करने से इन्कार कर दिया, जिनमें आरोप लगाया गया था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन करके ध्वस्तीकरण की कार्रवाइयां की गईं।

    हाई कोर्ट के सामने उठाई जाए ऐसी शिकायतें

    पीठ ने कहा कि ऐसी शिकायतें संबंधित हाई कोर्टों के सामने उठाई जानी चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि हर मामले में अलग-अलग तथ्य वाले विवाद होंगे और वह तथ्यों के आधार पर हर दावे पर निर्णय नहीं कर सकती। पीठ ने आदेश दिया, "हम इन कार्यवाहियों के रिकार्ड को संबंधित हाई कोर्टों को ट्रांसफर करना सही समझते हैं।"

    खबरें और भी

    सुप्रीम कोर्ट की बताई प्रकिया का नहीं हुआ पालन

    सुनवाई के दौरान एक वकील ने बताया कि एक खास मामले में सुप्रीम कोर्ट की बताई प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और ऐसे कई उदाहरण हैं जब इस तरह के ध्वस्तीकरण को साफ तौर पर "सजा देने वाली कार्रवाई" के तौर पर लिया जाता है।

    पीठ ने कहा कि 2024 का फैसला विभिन्न अपराधों में आरोपित लोगों के घरों को 'सजा देने वाली कार्रवाई' के तौर पर गिराने के बड़े चलन से निपटने के लिए ही जारी किया गया था, लेकिन यह फैसला गैरकानूनी निर्माण को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करने के लिए जारी नहीं किया गया था।

    एक मामले में पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सीयू सिंह ने कहा, "अगर सुप्रीम कोर्ट अपने ही फैसले के लिए खड़ा नहीं होगा, तो मुझे दुख है कि..." इस पर जस्टिस बागची ने फिर कहा कि फैसले को कानून की तरह नहीं देखा जा सकता। निर्देश एक चेतावनी के साथ होते हैं। ये दोहराते हैं कि कानूनी अधिकार क्या हैं। यह फैसला तब आया था, जब कोर्ट के अंतरात्मा को झटका लगा।

    बेगुनाही के अनुमान का आधार था... हां, जब अधिकारियों व अतिक्रमणकारियों के बीच भ्रष्टाचार से कानून का राज खत्म हो जाता है, तो बुलडोजर का इस्तेमाल करने की जरूरत होती है। लेकिन कानून लागू करने की आड़ में लोगों को चिह्नित नहीं करना चाहिए। यह बुनियादी सिद्धांतों के विरुद्ध है। सवाल यह है कि क्या कोई व्यक्ति अधिकृत था और क्या कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया था।

    यह भी पढ़ें- मस्जिद और चर्च के पास जमकर गरजा बुलडोजर, गुरुग्राम में वन विभाग ने अवैध निर्माण को ढहाया

    यह भी पढ़ें- मेरठ में बाहरी क्षेत्रों में बनी अवैध कॉलोनियों पर चलेगा प्रशासन का बुलडोजर? सुप्रीम कोर्ट ने मांगी रिपोर्ट