ओडिशा में धरती आबा योजना फेल: केंद्र के निर्देश के बाद भी बंद पड़ा वन भूमि अधिकार सेल, लाखों आवेदन लंबित
ओडिशा में आदिवासियों के वन भूमि अधिकार प्रकोष्ठ बंद होने से लाखों आवेदन लंबित हैं, जबकि केंद्र ने इन्हें फिर से सक्रिय करने का निर्देश दिया था। ...और पढ़ें

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HighLights
केंद्र ने वन भूमि अधिकार प्रकोष्ठ फिर से खोलने का निर्देश दिया।
राज्य सरकार की उदासीनता से लाखों आवेदन लंबित पड़े हैं।
सुंदरगढ़ में आदिवासी संगठन अपने हक के लिए आंदोलन कर रहे हैं।
जागरण संवाददाता, राउरकेला। राज्य में आदिवासियों को उनके जल-जंगल-जमीन का हक दिलाने की मुहिम प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ती दिख रही है। केंद्र सरकार के आदिवासी मामलों के मंत्रालय ने पांच महीने पहले 'धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष योजना' के तहत पूर्व में बंद किए जा चुके जिला और तहसील स्तरीय वन भूमि अधिकार प्रकोष्ठों (फॉरेस्ट लैंड राइट सेल्स) को फिर से सक्रिय करने का कड़ा निर्देश दिया था।
इस संबंध में केंद्रीय मंत्रालय के अनुसचिव लल्लन शर्मा ने ओडिशा सहित 30 राज्यों के मुख्य सचिवों और आदिवासी विकास विभाग के सचिवों को पत्र लिखकर इन इकाइयों को तुरंत क्रियाशील करने को कहा था।
योजना को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से राज्य स्तर पर दो लाख रुपये और जिला स्तर पर एक लाख रुपये प्रति माह के हिसाब से कुल 164 करोड़ रुपये का भारी-भरकम अनुदान भी स्वीकृत किया गया था।
इसके साथ ही पूरी प्रक्रिया के लिए विस्तृत मार्गदर्शिका भी जारी की गई थी, लेकिन इसके बावजूद राज्य सरकार इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है, जिससे आदिवासी समाज और बुद्धिजीवियों में भारी नाराजगी है।
पूर्व में वनों में निवास करने वाले आदिवासियों को खेती और आवास के लिए वन भूमि का कानूनी अधिकार दिलाने के उद्देश्य से राज्यभर में 242 वन भूमि अधिकार सेल गठित किए गए थे, जिनमें 494 संविदा कर्मचारियों की नियुक्ति की गई थी।
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ये सेल जमीनी स्तर पर लाभार्थियों की पहचान कर उन्हें पट्टा (शिरोनामा) दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे, लेकिन सितंबर 2025 से इन प्रकोष्ठों को अचानक बंद कर दिया गया। इस फैसले के बाद से राज्य के 37,466 गांवों में वन भूमि अधिकार मिलने की उम्मीदों पर पानी फिर गया है।
आंकड़ों के लिहाज से देखें तो राज्य में व्यक्तिगत वन भूमि अधिकार के लिए 6 लाख 79 हजार 224 आवेदन और सामुदायिक अधिकार के लिए 26 हजार 333 आवेदन प्राप्त हुए थे। इनमें से अब तक 4 लाख 51 हजार 364 व्यक्तिगत और मात्र 443 सामुदायिक अधिकार पत्र ही वितरित किए जा सके हैं, जबकि 1 लाख 44 हजार 891 व्यक्तिगत आवेदनों को खारिज कर दिया गया है।
वर्तमान स्थिति यह है कि राज्य में अब भी 1 लाख 52 हजार 919 व्यक्तिगत और 13 हजार 309 सामुदायिक वन भूमि अधिकार के आवेदन जांच की प्रक्रिया में लंबित पड़े हैं। इन लंबित पड़े आवेदनों की समयबद्ध समीक्षा कर आदिवासियों को उनका न्यायसंगत अधिकार सौंपने के लिए जिला, तहसील और राज्य स्तर पर इन प्रकोष्ठों का दोबारा चालू होना बेहद जरूरी है।
इस प्रशासनिक सुस्ती के खिलाफ सुंदरगढ़ जिले के विभिन्न आदिवासी संगठनों ने एकजुट होकर बार-बार आंदोलन किया है और सड़कों पर उतरे हैं, लेकिन प्रशासन की चुप्पी बरकरार है।
इस पूरे मामले में जब एकीकृत आदिवासी विकास एजेंसी (आईटीडीए) के परियोजना प्रशासक धीरेंद्र कुमार सेठी से संपर्क किया गया, तो उन्होंने कहा कि यह फैसला जिला स्तर पर नहीं लिया जा सकता, बल्कि इस पर अंतिम निर्णय राज्य स्तर से ही होना है।
उन्होंने आश्वासन दिया कि जैसे ही राज्य सरकार की ओर से कोई नया दिशा-निर्देश या आदेश प्राप्त होगा, जिला प्रशासन बिना किसी देरी के इस योजना को धरातल पर उतारने के लिए तैयार है। बहरहाल, अधिकारियों के इस गोलमोल जवाब से लाखों आदिवासियों का अपने हक के लिए चल रहा इंतजार और लंबा होता जा रहा है।