पेड़ से गिरने के बाद डॉक्टरों ने काटा हाथ, कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत को गोल्ड दिलाने वाले दिलीप गावित की दर्दनाक कहानी
पैरा धावक दिलीप महादू गावित ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है। बचपन में हाथ गंवाने के बावजूद उन्होंने अपनी दृढ़ इच् ...और पढ़ें

दिलीप गावित-मोहम्मद बासिल

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
पीटीआई, ग्लास्गो। पैरा धावक दिलीप महादू गावित की सफलता के पीछे संघर्षों से भरी कहानी छिपी है। महाराष्ट्र के नासिक के पास छोटे से गांव तोरण डोंगरी में जन्मे गावित महज छह वर्ष के थे, जब पेड़ से गिरने के दौरान उनके हाथ में गंभीर चोट लगी। समय पर उचित इलाज नहीं मिलने के कारण घाव में गैंगरीन हो गया और डॉक्टरों को उनकी कोहनी के नीचे का दाहिना हाथ काटना पड़ा। किसान परिवार से आने वाले गावित और उनके परिवार के लिए यह बड़ा झटका था, लेकिन उन्होंने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।
गांव में खेल सुविधाओं की कमी के बावजूद उन्होंने दौड़ना शुरू किया। उनकी प्रतिभा पर सबसे पहले कोच वैजयंथ काले की नजर पड़ी। काले ने बताया, मैंने उसे स्कूल में देखा था। उसके माता-पिता को प्रशिक्षण के लिए राजी किया। उसे पैरा खेलों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। वह सामान्य खिलाड़ियों की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर भी अच्छा प्रदर्शन कर रहा था।
खेलो इंडिया से राष्ट्रमंडल तक का सफर
पैरा एथलेटिक्स में आने से पहले भी गावित अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके थे। उन्होंने खेलो इंडिया यूथ गेम्स में दो पदक जीते थे और अंडर-18 स्तर पर भी एक पदक अपने नाम किया था। बाद में नासिक में बेहतर प्रशिक्षण मिलने के बाद उनका करियर नई ऊंचाइयों पर पहुंचा और अब उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों के सबसे बड़े मंच पर स्वर्ण जीतकर देश का नाम रोशन किया।
स्वर्ण पदक जीतने के बाद गावित ने कहा, "मेरी शुरुआत थोड़ी धीमी रही, लेकिन जैसे-जैसे दौड़ आगे बढ़ी, मैंने अपनी गति बढ़ाई और जीत हासिल करना शानदार अहसास रहा।" बारिश से भीगे ट्रैक पर दौड़ना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने चुनौती को अवसर में बदल दिया।
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अब लॉस एंजिलिस पैरालंपिक पर नजर
गावित ने साफ कहा कि उनकी मंजिल अभी खत्म नहीं हुई है। उन्होंने कहा, अभी नौकरी के बारे में नहीं सोच रहा हूं। मेरा लक्ष्य पदक जीतना है। मुझे भरोसा है कि सितंबर-अक्टूबर में जापान में होने वाले पैरा एशियाई खेलों और फिर 2028 लॉस एंजिलिस पैरालंपिक में मैं इससे भी बेहतर प्रदर्शन करूंगा।
जन्म से दिव्यांग, लेकिन हौसलों में कोई कमी नहीं
रजत पदक विजेता मोहम्मद बासिल भी प्रेरणा की मिसाल हैं। केरल के 21 वर्षीय बासिल जन्म से ही हाथ की दिव्यांगता के साथ पैदा हुए थे। माता-पिता और दो भाइयों के सहयोग से उन्होंने खेलों में अपनी पहचान बनाई और अब राष्ट्रमंडल खेलों में रजत पदक जीतकर भारत को गौरवान्वित किया।