Why Athletes Bite Medal: सिर्फ पोज नहीं, इसके पीछे है बड़ा इतिहास; जानिए मेडल क्यों काटते हैं खिलाड़ी
Athletes Bite Medal Reason: मेडल जीतने के बाद अक्सर एथलीट पोडियम पर खड़े होकर मेडल को दांत से काटते (Why Athletes Bite Medal) हैं। ...और पढ़ें

हरजिंदर कौर

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
स्पोर्ट्स डेस्क, नई दिल्ली। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 का 23 जुलाई से आगाज हुआ। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में 2 अगस्त तक यह आयोजन होगा। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में 122 भारतीय एथलीट ने हिस्सा लिया। भारतीय एथलीट की नजर ज्यादा से ज्यादा मेडल जीतने पर है। भारत के खाते में अब तक 12 मेडल आ भी चुके हैं। इनमें 2 गोल्ड, 7 सिल्वर और 3 ब्रॉन्ज शामिल हैं।
दांत से काटते हैं मेडल
मेडल जीतने के बाद अक्सर एथलीट पोडियम पर खड़े होकर मेडल को दांत से काटते (Why Athletes Bite Medal) हैं। ऐसी कई तस्वीरें आपने सोशल मीडिया पर देखी होंगी। ऐसे में सवाल उठता है ओलंपिक, कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स में मेडल जीतने के बाद एथलीट ऐसा क्यों करते हैं? वह सिर्फ पोज देने के लिए ऐसा करते हैं या इसके पीछे कोई इतिहास (Medal Bite History) छिपा है? तो आइए इन सवालों के जवाब जानते हैं।
लंबे समय से चल रही परंपरा
मेडल जीतने के बाद इसे दांत से काटने का कोई नियम नहीं है। यह लंबे समय से चली आ रही एक परंपरा है। दरअसल, पुराने समय में मुद्रा कीमती धातु से बनी होती थी। उस दौरे में सोने के सिक्कों की प्रामाणिकता जांचने के लिए व्यापारी उनको काटते थे।
सोना नरम धातु है और थोड़े ही दबाव में फट सा जाता है। साथ ही यह कुतरे जाने पर अपनी छाप छोड़ देता है। 1912 से पहले तक एथलीट को शुद्ध सोने के पदक दिए जाते थे। तब एथलीट इसे दांतों से काटते थे और सोने की शुद्धता की जांच करते थे। बाद में शुद्ध सोने के पदक बंद कर दिए गए, लेकिन यह परंपरा चली आ रही है।
मेडल में गोल्ड की परत
बता दें कि कॉमनवेल्थ गेम्स के गोल्ड मेडल में करीब 1 से 1.5 प्रतिशत ही असली सोना होता है। यह मुख्य रूप से 92.5 प्रतिशत चांदी से बना होता है जिस पर सोने की परत (प्लेटिंग) चढ़ाई जाती है। रजत पदक पूरी तरह स्टर्लिंग सिल्वर का और ब्रॉन्ज मेडल पूरी तरह कांसे का बना होता है।
रिपोर्ट्स की मानें तो 1 गोल्ड मेडल को बनाने में करीब 1-2 लाख रुपये का खर्च आता है। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के लिए तैयार मेडल को ग्लासगो की डिजाइनर मिलित्सा मिलेन्कोवा ने डिजाइन किया है। वहीं इनका निर्माण इंग्लैंड के बर्मिंघम की क्राफ्ट्स एजेंसी 'टॉय, केनिंग एंड स्पेन्सर' ने किया है।