अटारी सरहद पर रक्षाबंधन, 56 साल से जवानों को पूर्व मंत्री प्रो. चावला बांध रहीं राखी; बोलीं- ये मेरे भाई हैं
रक्षाबंधन पर अटारी-वाघा सरहद पर प्रो. लक्ष्मीकांता चावला ने जवानों को राखी बांधी। 1969 से जारी यह परंपरा सैनिकों और देशवासियों के भावनात्मक रिश्ते का प्रतीक है।

जवानों को राखी देते हुए छात्राएं।
HighLights
प्रो. चावला 56 सालों से जवानों को राखी बांध रही हैं।
अटारी-वाघा सीमा पर बीएसएफ जवानों को बांधती हैं राखी।
जवानों को अपना भाई मानकर करती हैं देश सेवा का सम्मान।
जागरण संवाददाता, अमृतसर। रक्षाबंधन पर घरों में बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं। भाई बहन की रक्षा का वचन देता है और बहन उसकी लंबी उम्र की कामना करती है। लेकिन अटारी-वाघा की सरहद पर रक्षाबंधन का नजारा कुछ अलग होता है। यहां देश की रक्षा में दिन-रात डटे जवानों की कलाई पर राखी बांधकर एक बहन अपनेपन का अहसास कराती है। यह बहन हैं पंजाब की पूर्व मंत्री प्रो. लक्ष्मीकांता चावला।
साल 1969 से प्रो. चावला रक्षाबंधन के दिन सरहद पर पहुंचकर बीएसएफ जवानों को राखी बांधती आ रही हैं। दशकों से चली आ रही यह परंपरा अब उनके जीवन का हिस्सा बन चुकी है। जवानों की कलाई पर राखी बांधते समय उनके चेहरे पर मुस्कान होती है, लेकिन आंखों में भावनाओं की नमी भी साफ दिखाई देती है।
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जवानों को राखी बांधते हुए प्रो. चावला।
जिनके भाई सीमा पर हैं, उनकी बहन बनना सौभाग्य
प्रो. चावला कहती हैं कि रक्षाबंधन का असली अर्थ तभी समझ में आता है, जब उन भाइयों को याद किया जाए जो त्योहार के दिन भी अपने घर नहीं जा पाते। जब देशभर की बहनें अपने भाइयों को राखी बांध रही होती हैं, तब हमारे जवान सीमा पर बंदूक थामे देश की रक्षा कर रहे होते हैं।
वह कहती हैं, “ये जवान मेरे लिए सिर्फ बीएसएफ के जवान नहीं, मेरे भाई हैं। इनके हाथ पर राखी बांधते हुए मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं अपने ही भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांध रही हूं।” जब प्रो. चावला उनके पास पहुंचती हैं और राखी बांधती हैं तो जवानों के चेहरे पर अपने घर की याद ताजा हो जाती है। कुछ जवान मुस्कुराकर राखी स्वीकार करते हैं तो कुछ की आंखें भी नम हो जाती हैं।
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जवानों को राखी बांधते हुए छात्राएं।
राखी की डोर में बंधा है पूरा देश
अटारी की सरहद पर बंधने वाली यह राखी सिर्फ एक धागा नहीं है। इसमें देश के करोड़ों लोगों का विश्वास, दुआ और सम्मान बंधा होता है। यह उस जवान की कलाई पर बंधती है जो गर्मी, सर्दी, बारिश और कठिन परिस्थितियों में सीमा की निगरानी करता है, ताकि देशवासी अपने घरों में सुरक्षित त्योहार मना सकें। प्रो. चावला का कहना है कि जवानों की वजह से ही देश की बहनें अपने भाइयों के साथ सुरक्षित रक्षाबंधन मना पाती हैं। इसलिए सरहद पर जवानों के साथ रक्षाबंधन मनाना उनके लिए किसी पूजा से कम नहीं।
56 साल से कायम है रिश्ता
1969 में शुरू हुआ यह सिलसिला अब पांच दशक से अधिक लंबा हो चुका है। पीढ़ियां बदल गईं, सरहद पर तैनाती बदलती रही, लेकिन प्रो. चावला की राखी की डोर नहीं बदली। हर साल वह जवानों के बीच पहुंचती हैं और उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं।
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