कन्या भ्रूण हत्या रोकथाम कानून के रिकॉर्ड में लापरवाही, हाईकोर्ट ने 80 वर्षीय डॉक्टर की सजा बरकरार रखी
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने बरनाला की 80 वर्षीय चिकित्सक की याचिका खारिज कर पीसीपीएनडीटी कानून के तहत दी गई सजा बरकरार रखी। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड का स ...और पढ़ें

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HighLights
हाईकोर्ट ने 80 वर्षीय डॉक्टर की सजा बरकरार रखी।
पीसीपीएनडीटी एक्ट रिकॉर्ड में लापरवाही गंभीर कानूनी उल्लंघन।
उम्र के आधार पर सजा में रियायत से इनकार किया।
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। कन्या भ्रूण हत्या रोकने से जुड़े पीसीपीएनडीटी एक्ट के एक अहम मामले में बरनाला की क्लीनिक संचालिका 80 वर्षीय डॉक्टर की सजा बरकरार रखा है। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि जरूरी रिकॉर्ड का सही रखरखाव न करना केवल तकनीकी चूक नहीं बल्कि गंभीर कानूनी उल्लंघन है।
जस्टिस रमेश चंद्र दीमरी ने डॉ. पुष्प लता मित्तल की ओर से दायर पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत के फैसले को सही ठहराया। निचली अदालतों ने उन्हें पीसीपीएनडीटी एक्ट, 1994 की धारा 29 के उल्लंघन का दोषी मानते हुए सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि पीसीपीएनडीटी एक्ट एक सामाजिक कल्याण कानून है जिसका उद्देश्य कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाना और बालिका के जीवन के अधिकार की रक्षा करना है। अदालत ने कहा कि एक्ट के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए रिकॉर्ड का सही रखरखाव बेहद जरूरी है और इसमें किसी भी प्रकार की कमी दंडनीय है।
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जांच खामियों के आधार पर मांगी रियायत
डॉक्टर की ओर से दलील दी गई थी कि क्लीनिक की जांच और तलाशी प्रक्रिया में खामियां थीं इसलिए बरामद दस्तावेजों को सबूत नहीं माना जा सकता। हालांकि कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि यदि तलाशी प्रक्रिया में कोई अनियमितता भी हो तब भी प्रासंगिक और स्वीकार्य दस्तावेजों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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कोर्ट ने पाया कि क्लीनिक से बरामद कई फॉर्म-एफ पर संबंधित डॉक्टर के हस्ताक्षर नहीं थे, जो कानून के तहत अनिवार्य हैं। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने भी यह विवाद नहीं किया कि दस्तावेज उसके क्लीनिक से ही मिले थे।
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कोर्ट ने हस्ताक्षेप से किया इनकार
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र सीमित होता है और जब तक निचली अदालतों के फैसलों में स्पष्ट कानूनी त्रुटि या न्याय का गंभीर हनन न हो, तब तक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
डॉ. मित्तल ने 80 वर्ष से अधिक उम्र होने के आधार पर सजा में नरमी की भी मांग की थी लेकिन कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि पीसीपीएनडीटी एक्ट के उल्लंघन की प्रकृति ऐसी नहीं है जिसमें केवल उम्र के आधार पर राहत दी जाए। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने एक वर्ष के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी।