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    बेअदबी कानून को हाई कोर्ट में नई चुनौती, जनहित याचिका में धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक वैधता पर उठे सवाल

    Updated: Fri, 08 May 2026 12:52 PM (IST)

    पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में दायर जनहित याचिका में बेअदबी कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने कानून को एक धर्म विशेष तक सीम ...और पढ़ें

    पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट।

    पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट।

    HighLights

    1. बेअदबी कानून को हाई कोर्ट में नई चुनौती मिली।

    2. याचिका में संवैधानिक वैधता, धर्मनिरपेक्षता पर सवाल।

    3. राष्ट्रपति की मंजूरी न होने पर भी आपत्ति।

    दयानंद शर्मा,चंडीगढ़। पंजाब सरकार द्वारा बेअदबी रोकने के उद्देश्य से लागू किए गए “जागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) एक्ट” पर कानूनी संकट और गहरा गया है। इस कानून के खिलाफ पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में अब एक और जनहित याचिका दाखिल कर दी गई है।

    जालंधर निवासी करनप्रीत सिंह ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए इस संशोधन एक्ट को संविधान की मूल भावना, धर्मनिरपेक्ष ढांचे और केंद्रीय कानूनों के विपरीत बताते हुए रद्द करने की मांग की है। गुरुवार को इस याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई के दौरान विस्तृत बहस हुई, जिसके बाद अदालत ने मामले की सुनवाई शुक्रवार तक स्थगित कर दी।

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    सर्वधर्म समभाव आधारित विधेयक की मांग

    याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि पंजाब सरकार ने पहले 14 जुलाई 2025 को विधानसभा में “द पंजाब प्रिवेंशन ऑफ ऑफेंसेज अगेंस्ट होली स्क्रिप्चर्स बिल-2025” पेश किया था, जिसमें श्री गुरु ग्रंथ साहिब, कुरान मजीद और श्रीमद्भगवद्गीता सहित विभिन्न धर्मों के पवित्र ग्रंथों को संरक्षण देने का प्रस्ताव रखा गया था।

    लेकिन उस व्यापक और सर्वधर्म समभाव आधारित विधेयक पर आगे बढ़ने के बजाय सरकार ने केवल “जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब” तक सीमित संशोधन कानून पारित कर दिया। यह संशोधन 12 अप्रैल को विधानसभा से पारित हुआ और 20 अप्रैल को इसकी गजट अधिसूचना भी जारी कर दी गई।

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    समानता व धर्मनिरपेक्षता सिद्धांत पर उठा प्रश्न 

    याचिका में सबसे बड़ा संवैधानिक सवाल यह उठाया गया है कि जब राज्य एक ही धर्म के पवित्र ग्रंथ को विशेष कानूनी संरक्षण देता है और अन्य धर्मों के पवित्र ग्रंथों को बाहर रखता है, तो यह संविधान के समानता और धर्मनिरपेक्षता सिद्धांत पर सीधा प्रश्न खड़ा करता है।

    याचिकाकर्ता का तर्क है कि भारत का संविधान सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण की अपेक्षा करता है, ऐसे में किसी एक धर्म को अलग कानूनी संरक्षण देना न्यायिक परीक्षण के दायरे में आएगा।

    राष्ट्रपति की स्वीकृति न होने पर भी उठा सवाल

    इसके साथ ही याचिका में यह भी कहा गया कि इस एक्ट में उम्रकैद तक की सजा, विशेष जांच प्रक्रिया और कठोर दंडात्मक प्रावधान शामिल किए गए हैं, जबकि आपराधिक कानून समवर्ती सूची का विषय है और भारतीय न्याय संहिता जैसे केंद्रीय कानून पहले से इस क्षेत्र को नियंत्रित करते हैं।

    इसलिए, अनुच्छेद 254 के तहत राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक थी। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि केवल राज्यपाल की मंजूरी के आधार पर कानून लागू करना विधायी प्रक्रिया की गंभीर त्रुटि है।

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