Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    OTT से हटी फिल्म 'सतलुज', समर्थन-विरोध के बीच पंजाब में छिड़ी बहस; दिलजीत बोले- इंटरनेट से अब कोई हटा नहीं सकता

    Updated: Mon, 06 Jul 2026 12:46 PM (IST)

    अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज (पंजाब 95)' भारत में ओटीटी से हटाए जाने के बाद विवादों में घिर गई है। दिलजीत ने लाइव आकर विरोध जताया, जबकि फिल्म ...और पढ़ें

    HighLights

    1. फिल्म 'सतलुज (पंजाब 95)' ओटीटी से दो दिन बाद हटाई गई।

    2. दिलजीत दोसांझ ने लाइव आकर फिल्म हटाने का विरोध किया।

    3. खालड़ा के जीवन पर आधारित फिल्म, पंजाब में राजनीतिक बहस तेज।

    रोहित कुमार, चंडीगढ़। अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज (पंजाब 95)' एक बार फिर विवादों में आ गई है। सेंसर और रिलीज को लेकर लंबे समय तक चली प्रक्रिया के बाद ओटीटी मंच पर आई इस फिल्म को भारत में रिलीज के महज दो दिन बाद हटा दिया गया। इसके बाद इंटरनेट मीडिया पर तीखी बहस शुरू हो गई है। वहीं, दिलजीत दोसांझ ने भी लाइव आकर विरोध जताया है। 

    दिलजीत ने लाइव आकर कहा- 

    बात शुक्रवार को पता थी कि ऐसा हो सकता है। लेकिन अनुमान था कि सोमवार जब ऑफिस खुलेंगे तो शायद फिल्म बैन की जाएगी। लेकिन, संडे शाम को ही हो जाएगी, इसका अंदाजा नहीं था। पहले से ही डर था, इसलिए इसकी प्रमोशन भी नहीं कर सके। लेकिन खुशी है कि ये फिल्म अब घर-घर पहुंच चुकी है। इंटरनेट पर आई चीज हटाई नहीं जा सकती। वे किसी भी तरह से इसे दूसरों तक पहुंचाएं।

    कई लोगों द्वारा इसे पंजाब के इतिहास के एक दर्दनाक दौर को सामने लाने वाली फिल्म बता रहे हैं, तो कोई इसे आतंकवाद के दौर की घटनाओं को एकतरफा तरीके से पेश करने वाला प्रयास मान रहे हैं।

    अब यह विवाद मनोरंजन तक सीमित न रहकर राजनीतिक मुद्दा भी बन गया है। फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और उनके संघर्ष पर आधारित है। इसमें पंजाब पुलिस के दो एसएसपी और एक डीआईजी के किरदार भी दिखाए गए हैं, जिनको लेकर भी चर्चा हो रही है।

    यह भी पढ़ें- पाकिस्तान से भारत भेजी गई 84 करोड़ की हेरोइन, अमृतसर पुलिस ने की रिकवर; सुरक्षा एजेंसियां जांच में जुटी

    सांसद साहनी आए समर्थन में

    पंजाब से राज्यसभा सदस्य विक्रमजीत सिंह साहनी ने एक्स पर फिल्म का समर्थन करते हुए लिखा कि यह फिल्म पंजाब के उस दर्दनाक दौर की याद दिलाती है, जब आतंकवाद के समय हजारों पंजाबी युवाओं के कथित फर्जी मुठभेड़ों में मारे जाने के आरोप लगे। उन्होंने लिखा कि 1984 के बाद अमृतसर के बैंक निदेशक रहे जसवंत सिंह खालड़ा मानवाधिकार कार्यकर्ता बने।

    उस समय पुलिस को संदिग्ध आतंकवादियों के खिलाफ व्यापक अधिकार मिले थे। साहनी के अनुसार, खालड़ा ने कथित फर्जी मुठभेड़ों की जांच शुरू की और नगर निगम के श्मशान घाटों के रिकॉर्ड जुटाए। उन्होंने दावा किया कि केवल अमृतसर में 6,107 ऐसे शवों का दस्तावेजी रिकार्ड मिला, जिनका पुलिस द्वारा गुप्त रूप से अंतिम संस्कार किए जाने का आरोप था। बाद में अन्य जिलों में भी ऐसे हजारों मामलों का जिक्र सामने आया।

    खबरें और भी

    यह भी पढ़ें- पंजाब कांग्रेस का डैमेज कंट्रोल! चंडीगढ़ पहुंचेंगे भूपेश बघेल, चन्नी-वड़िंग विवाद सुलझाने की कोशिश

    10 साल के शवों की सूची हुई थी प्रकाशित

    साहनी ने अपने पोस्ट में लिखा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अमृतसर शहर, मजीठा और तरनतारन में जून 1984 से दिसंबर 1994 के बीच पुलिस द्वारा किए गए अंतिम संस्कारों से जुड़े पहचाने गए शवों की सूची प्रकाशित की थी। उन्होंने यह भी कहा कि उच्चतम न्यायालय और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इन रिकॉर्डों की प्रामाणिकता स्वीकार की थी।

    उन्होंने पृथपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में जसवंत सिंह खालड़ा को ऐसे मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में वर्णित किया था, जिन्होंने कथित अपहरण, हत्या और बिना रिकॉर्ड किए गए अंतिम संस्कारों के मामलों को उजागर किया।

    पूर्व लेफ्टिनेंट भी आए समर्थन में

    साहनी ने यह भी लिखा कि खालड़ा ने अपने निष्कर्षों के आधार पर अनुमान लगाया था कि 25 हजार से अधिक सिखों की कथित रूप से अवैध हत्या कर उनका अंतिम संस्कार किया गया हो सकता है। उन्होंने 1995 में खालड़ा के अंतिम सार्वजनिक भाषण का भी जिक्र किया।

    पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल और  केजेएस ढिल्लों ने भी फिल्म का समर्थन किया। उन्होंने एक्स पर लिखा कि 'सतलुज (पंजाब 95)' एक ऐसे व्यक्ति के साहस और अन्याय के खिलाफ उसके संघर्ष की प्रभावशाली कहानी है। उन्होंने फिल्म को जरूर देखे जाने योग्य बताया और दिलजीत दोसांझ तथा अर्जुन रामपाल के अभिनय की सराहना की।

    अकाली दल ने जताई आपत्ति

    वहीं, शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने भारत में फिल्म को जी5 से हटाए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि यह फिल्म पंजाब के दर्दनाक इतिहास को सामने लाती है और जसवंत सिंह खालड़ा के सर्वोच्च बलिदान को सम्मान देती है। बादल ने इसे केवल सेंसरशिप नहीं बल्कि सामूहिक स्मृति, सच और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया। उन्होंने कहा कि पंजाब को अपने अतीत का सामना ईमानदारी से करना चाहिए, उसे दबाया नहीं जाना चाहिए।

    पूर्व अधिकारी आए विरोध में

    हालांकि, इस पूरे विवाद पर पंजाब पुलिस के कई पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों का अलग पक्ष भी सामने आया है। उनका कहना है कि 1980 और 1990 के दशक में पंजाब अभूतपूर्व आतंकवाद की चपेट में था। यदि उस समय पुलिस और सुरक्षा बलों ने सख्त कार्रवाई नहीं की होती तो राज्य में आतंकवाद पर काबू पाना संभव नहीं होता।

    उनका कहना है कि उस दौर में हजारों निर्दोष नागरिक, पुलिसकर्मी और सुरक्षाबलों के जवान भी आतंकवाद का शिकार हुए थे। ऐसे में उस समय की परिस्थितियों और आतंकवाद की गंभीरता को नजरअंदाज कर केवल एक पक्ष के आधार पर पूरे घटनाक्रम का आकलन करना उचित नहीं होगा।

    मानवाधिकार की स्वतंत्रता की दी जा रही दलीलें

    फिल्म के रिलीज होने के महज दो दिन बाद ओटीटी मंच से हटाए जाने के बाद यह विवाद अब मनोरंजन जगत से आगे बढ़कर राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बन गया है।

    एक ओर फिल्म के समर्थन में मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दलीलें दी जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर आतंकवाद के खिलाफ पंजाब पुलिस की भूमिका और उस समय की परिस्थितियों को भी उतना ही महत्वपूर्ण बताया जा रहा है। इसी कारण 'सतलुज (पंजाब 95)' एक बार फिर पंजाब के इतिहास और उसकी सबसे कठिन अवधि पर नई बहस का केंद्र बन गई है।

    यह भी पढ़ें- बटाला में हाईवे किनारे खड़े खराब ट्रक में रेत से भरा टिप्पर टकराया, केबिन में फंसा चालक; SSF ने बचाई जान