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    भारत का इकलौता मंदिर जहां दी जाती है बकरे की 'सात्विक बलि', नहीं बहता एक भी बूंद खून!

    Updated: Sun, 02 Aug 2026 03:30 PM (IST)

    बिहार के कैमूर जिले में स्थित मां मुंडेश्वरी मंदिर भारत का सबसे पुराना जीवित मंदिर है, जिसका निर्माण 108 ईस्वी में हुआ था। यह मंदिर अपनी अष्टकोणीय वास ...और पढ़ें

    कैमूर जिले में स्थित मां मुंडेश्वरी देवी का मंदिर

    कैमूर जिले में स्थित मां मुंडेश्वरी देवी का मंदिर

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। बिहार के कैमूर जिले के पवरा पहाड़ी पर बसा मां मुंडेश्वरी मंदिर, जो अद्भुत शक्तिपीठ होने के साथ भारत का सबसे पुराना जीवित मंदिर भी है। इस मंदिर का निर्माण करीब 108 ईस्वी में किया गया था, जो इस मंदिर को स्थापत्य और आस्था दोनों के नजरिए से अलग बनाता है।

    मंदिर में मां मुंडेश्वरी की अष्टभुजी प्रतिमा स्थापित है, जिनकी पूजा सुरक्षा और सिद्धि प्राप्ति के लिए की जाती है। मंदिर में एक शिवलिंग भी स्थापित है, जिसक कारण शैव और शक्त दोनों संप्रदायों के लिए यह काफी महत्वपूर्ण हो जाता है।

    अष्टकोणीय मंदिर होने के कारण इसकी वास्तुकला, शिल्पकला और पहाड़ पर बसे होने के कारण इसके दर्शन करना काफी मनोरम लगता है। नवरात्रि, वसंत पंचमी और महाशिवरात्रि के मौके पर मंदिर में हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।

    मां मुंडेश्वरी मंदिर का रहस्य

    कैमूर जिले में स्थित मां मुंडेश्वरी मंदिर अपनी प्राचीनता के साथ-साथ बलि देने के अनोखे तरीके के लिए भी जाना जाता है। यहां खासतौर पर बिना खून बहाए बकरे की सात्विक बलि दी जाती है।

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    इसके बाद उसे जीवित छोड़ दिया जाता है। इसके अलावा मंदिर में स्थित पंचमुखी शिवलिंग को लेकर मान्यता है कि, इसका रंग हमेशा बदलता रहता है साथ ही दुनिया के सबसे पुराने चालू मंदिरों में से एक है।

    मंदिर से जुड़ी मुख्य बातें

    मां मुंडेश्वरी मंदिर तक पैदल जाने के लिए सीढ़ियों की भी व्यवस्था है। मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 550 से 600 सीढ़ियां चढ़नी होती है। मंदिर पहाड़ी पर इस स्थिति है, जो करीब 608 फीट ऊपर है।

    सीढ़ियों के अलावा वाहन के माध्यम से भी ऊपर जाने के लिए सड़क मार्ग की व्यवस्था है। वहीं मां मुंडेश्वरी का वाहन महिष (सांड/भैंसा) है, क्योंकि मां को वाराही देवी के रूप में पूजा जाता है।

    पौराणिक कथाएं क्या कहती हैं?

    हिंदू धर्म के पवित्र देवी ग्रंथ दुर्गा सप्तशती में कथा आती है कि, चंड-मुंड के नाश के बाद देवी उग्र हो गई थीं, तो चंड को मारने के बाद मुंड युद्ध करते हुए इसी पहाड़ी में जा छिपा और यही पर माता ने उसका वध किया था।

    इसीलिए स्थानीय लोग उन्हें देवी मुंडेश्वरी के नाम से पूजते हैं। यहां पूजा करने की परंपरा आज से नहीं बल्कि 1900 सालों से लगातार चली आ रही है।

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