नीलकंठ महादेव मंदिर: हलाहल पीने के बाद गले की जलन मिटाने के लिए यहां की थी महादेव ने तपस्या
जानें नीलकंठ महादेव मंदिर की पौराणिक कथा। समुद्र मंथन में हलाहल पीने के बाद गले की जलन शांत करने के लिए भगवान शिव ने यहीं तपस्या की थी। ...और पढ़ें

कालिंजर का नीलकंठ महादेव मंदिर। (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सावन के महीने में भगवान शिव के हर स्वरूप के दर्शन किए जाते हैं और उनकी सेवा की जाती है। भारतभर में भगवान शिव के हजारों मंदिर हैं और सभी की अपनी अलग विशेषता है। उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के छोटे से कस्बे कालिंजर में भी एक शिव शंभू का मंदिर है। इस मंदिर से जुड़ी एक पौराणिक कथा है। बांदा की सरकारी साइट में आपको इस मंदिर के बारे में पढ़ने के लिए काफी कुछ मिल जाएगा।
इसके अलावा शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता में भगवान नीलकंठ महादेव के एक लिंग को कालिंजर पर्वत पर विराजमान बताया गया है। वहीं स्कंद पुराण में भी इस स्थान की महिमा का वर्णन मिलता है और वामन पुराण में तो कालिंजर को भगवान नीलकंठ का निवास स्थल ही बताया गया है।
सावन के महीने में इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ इकट्ठा होती है। भक्त अपने महादेव को जल अर्पित करने यहां दूर-दूर से आते हैं। चलिए हम आपको इस मंदिर से जुड़े कुछ रोचक तथ्य बताते हैं।
नीलकंठ महादेव से जुड़ी कथा
धार्मिक शास्त्रों में बताया गया है कि जब समुद्र मंथन हुआ, तब हलाहल ग्रहण करने के बाद भगवान शिव इसी स्थान पर उसकी जलन कम करने और काल को मात देने के लिए तपस्या करने आए थे। मंदिर में भगवान शिव का जो लिंग है, इसलिए उसे नीलकंठ महादेव के नाम से पुकारा जाता है।
नीले शिवलिंग की होती है पूजा
यह मंदिर केवल नाम से नीलकंठ नहीं है बल्कि यहां पर मौजूद भगवान शिव का लिंग भी नीले पत्थर का है। यह एकमुखी शिवलिंग है। बताया जाता है कि शिवलिंग का कंठ छूने पर मुलायम लगता है। इस लिंग को देखकर, लगता है मानो सच में भगवान शिव के नीलकंठ स्वरूप के दर्शन हो गए।
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प्राकृतिक जलाभिषेक
इस मंदिर में बहुत सी पौराणिक मूर्तियां हैं, मगर लगभग सभी खंडित हैं। यहां केवल नीलकंठ महादेव की ही पूजा होती है। शिवलिंग के ठीक ऊपर से प्राकृतिक झरने की एक धार बहती रहती है, जिससे महादेव का जलाभिषेक होता रहता है। इस मंदिर में आपको भगवान भैरव, श्री हनुमान, माता महिषासुर मर्दिनी और श्री गणेश जी की प्रतिमा पहाड़ पर उकेरी हुई मिल जाएंगी। इन्हें बारीक और खूबसूरत नक्काशी के साथ उकेरा गया है।इस मंदिर तक पहुंचने में 120 से 165 सीढि़यों का सफर तय करना होता है, मगर शिव भक्तों के लिए इस सफर को तय करना मुश्किल नहीं होता है, वे अपने शिवशंभु को हलाहल की जलन से मुक्त कराने के लिए यहां दूर-दूर से आते हैं।
मंदिर का इतिहास
कालिंजर के इस मंदिर का जिक्र कई पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। सतयुग में इस स्थान को कीर्तिनगर, त्रेतायुग में मध्यगढ़ और द्वापर युग में सिंहलगढ़ और कलियुग में कालिंजर कहा गया। यहां गुप्त वंश से लेकर चंदेल शासकों तक ने राज किया और इस मंदिर को बनाने में अपने-अपने तरह से सहयोग दिया। इस मंदिर में नीलकंठ महादेव के अलावा सीता सेज, पाताल गंगा, पांडव कुंड, भैरव कुंड, मृगधार आदि भी देखने लायक जगहें हैं।
अतः आप यदि बांदा या उसके आस-पास के निवासी हैं, तो सावन में आपको नीलकंठ महादेव मंदिर जरूर जल अर्पित करने आना चाहिए।
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