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पूजा-पाठ में बजने वाले शंख की गूंज से दूर होती है नकारात्मकता, इसके पीछे हैं धार्मिक और वैज्ञानिक कारण

Updated: Thu, 20 Aug 2026 01:02 PM (IST)

पूजा-पाठ में बजने वाले शंख की गूंज से नकारात्मकता दूर होती है, जिसके धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों कारण हैं। चलिए ...और पढ़ें

क्या शंखनाद से जुड़ी है सकारात्मकता? (AI-Generated Image)

क्या शंखनाद से जुड़ी है सकारात्मकता? (AI-Generated Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में पूजा-पाठ या किसी भी धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत शंखनाद से करने की परंपरा है। मंदिरों में आरती के समय शंख की आवाज सुनाई देना आम बात है। मान्यता है कि शंख की आवाज वातावरण को सकारात्मक बना देती है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। यही वजह है कि इसे केवल पूजा की वस्तु नहीं, बल्कि शुभता और पवित्रता का प्रतीक भी माना जाता है।

समुद्र मंथन से जुड़ा है शंख का संबंध

एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषी श्री चंद्रेश शर्मा का कहते हैं धार्मिक ग्रंथों में वर्णन है कि शंख की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान चौदह रत्नों में से एक के रूप में हुई थी, जिसे माता लक्ष्मी का भ्राता (भाई) माना जाता है। शंख की ध्वनि को 'ॐ' की ध्वनि के समकक्ष माना गया है। शंखनाद से वातावरण में ऊर्जा का प्रवाह होता है, जिससे देव शक्तियां जाग्रत होती हैं और वातावरण पवित्र बनता है। यही कारण है कि घर के मंदिर में शंख रखना और पूजा के दौरान उसका इस्तेमाल करना शुभ माना जाता है।

वहीं, किसी भी शुभ कार्य या पूजा-आरती के आरंभ में शंख बजाना अत्यंत शुभ माना गया है।

"शंखनादेन दैत्यानां दर्पहानिः प्रजायते।"- ब्रह्मवैवर्त पुराण

धार्मिक और पौराणिक दृष्टिकोण

वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो शंख बजाने से उत्पन्न होने वाली तरंगे आसपास के वातावरण से हानिकारक सूक्ष्म जीवाणुओं को नष्ट करती हैं। इससे आसपास के परिसर की शुद्धि होती है।

भगवान विष्णु के चार प्रमुख आयुधों में शंख भी शामिल है। उनके हाथ में मौजूद शंख को 'पाञ्चजन्य' कहा जाता है। इसलिए धार्मिक दृष्टि से शंख को भगवान विष्णु की शक्ति और धर्म की विजय से भी जोड़कर देखा जाता है।

शंख के बारे में वणर्न करते हुए यह श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय का 15वां श्लोक है, जो कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में योद्धाओं द्वारा अपने-अपने शंख बजाने का वर्णन करता है।

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः॥

इस श्लोक का अर्थ है-

भगवान श्रीकृष्ण (हृषीकेश) ने 'पाञ्चजन्य' नामक शंख बजाया, अर्जुन (धनंजय) ने 'देवदत्त' नामक शंख बजाया और भयानक पराक्रमी कार्य करने वाले भीमसेन (वृकोदर) ने 'पौण्ड्र' नामक महाशंख बजाया।

शंखनाद से क्यों जुड़ी है सकारात्मकता?

धार्मिक मान्यता के मुताबिक, शंख की ध्वनि को पवित्र ध्वनि माना गया है। पूजा के दौरान जब शंख बजाया जाता है तो उसकी गूंज काफी दूर तक सुनाई देती है। माना जाता है कि यह ध्वनि वातावरण में मौजूद नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती है और मन को पूजा के लिए एकाग्र करने में मदद करती है।

मन और वातावरण पर पड़ता है असर

शंख की गहरी और लगातार गूंजती आवाज पूजा के माहौल को विशेष बना देती है। इसकी ध्वनि सुनते ही व्यक्ति का ध्यान आसपास की गतिविधियों से हटकर पूजा और आध्यात्मिक वातावरण की ओर जाता है। यही वजह है कि सदियों से मंदिरों और घरों की पूजा में शंखनाद को खास स्थान मिला हुआ है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।