जब रूठीं माता लक्ष्मी को मनाने के लिए भगवान जगन्नाथ ने खिलाया रसगुल्ला, जानें 'नीलाद्री बीजे' की दिलचस्प कथा
भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा का अंतिम अनुष्ठान नीलाद्री बीजे है, जब वे गुंडिचा मंदिर से लौटकर अपने मुख्य मंदिर में प्रवेश करते हैं। ...और पढ़ें

भगवान जगन्नाथ और मां लक्ष्मी से जुड़ी पौराणिक कथा (Picture Credits- AI Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। उड़ीसा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथ भव्य शोभायात्रा से कहीं ज्यादा मनमोहक और आकर्षक है। इस साल रथ यात्रा 16 जुलाई, 2026 को शुरू हुई थी, जिसका समापन 24 जुलाई 2026, शुक्रवार को होगा। उनकी घर वापसी की यात्रा को बहुदा यात्रा कहा जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार, जो भी लोग एक सप्ताह तक गुंडिचा मंदिर में विराजमान चारों देवताओं के दर्शन करते हैं, तो उन्हें अपने पूर्वजों के साथ स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।
जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत होने के बाद ही कई तरह के प्रमुख अनुष्ठान किए जाते हैं। इनमें सबसे खास है नीलाद्री बीजे अनुष्ठान जब भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ मौसी गुंडिचा के मंदिर में प्रवास करने के बाद श्री जगन्नाथ धाम की ओर प्रस्थान करते हैं। नीलाद्री बीजे रथयात्रा का सबसे अंतिम अनुष्ठान है। आइए जानते हैं इसके बारे में।
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नीलाद्री बीजे का मतलब?
नीलाद्री का मतलब भगवान जगन्नाथ का मंदिर जिस पवित्र पहाड़ी पर बसा है, उसका अर्थ है नीला पर्वत। जबकि बीजे का मतलब, प्रवेश करना या अपनी जगह पर बैठना। नीलाद्री बीजे उस शुभ फल को दर्शाता है, जब भगवान जगन्नाथ अपने मंदिर में फिर से प्रवेश करते हैं और विधिपूर्वक अपने दिव्य सिंहासन पर विराजमान होते हैं।
हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई-बहन के साथ रथ यात्र पर निकलते हैं और गुंडिचा मंदिर में प्रस्थान करते हैं। नौ दिनों गुंडिचा मंदिर में रहने के बाद देवता बहुदा यात्रा के दौरान फिर से जगन्नाथ धाम लौट आते हैं।
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हालांकि मंदिर पहुंचने के बाद भी देवता फौरन गर्भगृह में प्रवेश नहीं करते हैं। नीलाद्री बीजे के दिन सभी पारंपरिक अनुष्ठानों के पूरे होने के बाद ही भगवान जगन्नाथ को विधिपूर्वक रत्न पर स्थापित किया जाता है।

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देवी लक्ष्मी और भगवान जगन्नाथ से जुड़ी पौराणिक कथा
नीलाद्री बीजे से जुड़ी एक सुप्रसिद्ध कथा देवी लक्ष्मी की है। परंपरा के मुताबिक, जब भगवान जगन्नाथ अपने भाई-बहनों के साथ गुंडिचा मंदिर के लिए रवाना हुए तो वे देवी लक्ष्मी को अपने साथ नहीं ले गए। इससे माता लक्ष्मी काफी नाराज हो गई।
जब भगवान जगन्नाथ वापस जगन्नाथ मंदिर लौटे, तो देवी लक्ष्मी ने उन्हें अंदर आने से रोक दिया। तब उन्हें खुश करने के लिए भगवान जगन्नाथ ने रसगुल्ला भेंट किया। इसलिए इस दिन को रसगुल्ला दिबासा के नाम से भी जाना जाता है। आखिरकार देवी लक्ष्मी ने उन्हें क्षमा कर दिया और मंदिर के द्वार खोल दिए। इसलिए नीलाद्री बीजे के दिन भगवान जगन्नाथ को रसगुल्ला चढ़ाने की भी परंपरा है।
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