144 साल तक कहां और क्यों गायब थे भगवान जगन्नाथ? जानें पुरी मंदिर का अनसुना इतिहास
भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां एक बार 144 साल तक पुरी से दूर रहीं, जब मंदिर के सेवकों ने उन्हें हमलावरों से बचाने के लिए पाताली श्रीक्षेत्र में छिपा दिया ...और पढ़ें

भगवान जगन्नाथ 144 साल तक कहां गायब रहे?

समय कम है?
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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। उड़ीसा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर के बारे में कहा जाता है कि, एक समय ऐसा भी आया था, जब करीब 144 सालों तक जगत के नाथ को पुरी से दूर रहना पड़ा था, क्योंकि हमले के दौरान मंदिर के सेवकों ने पवित्र मूर्तियां को सुरक्षित रखने के लिए चुपके से पाताली श्रीक्षेत्र पहुंचा दिया था।
मादला पंजी में उल्लेख पारंपरिक वृत्तांतों से पता चलता है कि, मूर्तियों को आज के ओडिशा की पहाड़ियों में छिपाकर रखा गया था, जिसकी सुरक्षा मंदिर के पुजारियों, ग्रामीणों और स्थानीय शासकों द्वारा की गई थी। मुसीबत टलने के बाद माना जाता है कि, मूर्तियों एक बार फिर से पुरी लौट आईं और जगन्नाथ मंदिर में पूजा-अर्चना फिर से शुरू हो गई। आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक कहानी के बारे में।
भगवान जगन्नाथ 144 साल तक क्यों गायब रहे?
जगन्नाथ भगवान को हमलावर ताकतों से बचाने के लिए मंदिर के सेवकों और पुजारी ने उन्हें चुपके से पुरी से हटा दिया। उन्हें आज के सुबरनपुर में त्रिकूट पहाड़ियों के पास पाताली श्रीक्षेत्र में छिपाया गया था। इस जगह ने प्रभु जगन्नाथ को छिपे रहने और सुरक्षित रखने में मदद की थी।
पाताली का मतलब छिपा हुआ या जमीन के नीचे होता है, जो इस स्थान की पवित्र परंपरा को दर्शाता है। देवता करीब 144 साल तर वहीं रहे। स्थानीय शासकों, पुजारियों और गांववालों ने जान जोखिम में डालकर इस राज को सुरक्षित रखा।
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माना जाता है कि, जब हमलावर का खतरा टलने के बाद राजा ययाति केशरी देवता को फिर से मंदिर वापस ले आए। इसके बाद एक बार फिर से भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा शुरू हो गई। इससे मंदिर के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया।
यह कहानी मदाला पंजी और स्थानीय परंपराओं में आज भी सुरक्षित है। इतिहासकारों ने भी इस स्थान और इसके महत्व का गहन अध्ययन किया। पाताली क्षेत्र भक्ति और विरासत का एक जरूरी स्थान बना हुआ है।
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रक्तबाहु के आक्रमण से गांव वालों ने प्रभु को बचाया
इतिहासकारों का मानना है कि, करीब 1000 साल पहले भगवान जगन्नाथ दो बार गोपाली गांव के त्रिकुटा पहाड़ियों में भूमिगत थे। आछवीं शताब्दी के आसपास जब रक्तबाहु ने मंदिर पर आक्रमण किया, तब भगवान को गांव में लाया गया और 45 सालों तक भूमिगत रखा गया।
इस दावे की पुष्टि मदलपंजी, सोनपुर इतिहास, सोनपुर राजगृह चंद्रिका, स्वर्णपुर गुणदर्श, कालियाक पुराण, दशकुमार चरिता और तत्कालीन सोनपुर राज्य के अन्य दरबारी प्रकाशन में की गई है।
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