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    क्या हर साल बदलती है भगवान जगन्नाथ की मूर्ति; जानें 'नवकलेवर' का गुप्त रहस्य और 2026 में क्यों नहीं बनेगी नई प्रतिमा?

    Updated: Fri, 17 Jul 2026 07:30 PM (GMT+05:30)

    भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा की शुरुआत हो चुकी है। कई लोगों को लगता है कि, हर साल रथ यात्रा से पहले भगवान जगन्नाथ की मूर्ति बदली जाती है; क्या है इसके प ...और पढ़ें

    नवकलेवर की परंपरा इस साल क्यों नहीं निभाई जाएगी?

    नवकलेवर की परंपरा इस साल क्यों नहीं निभाई जाएगी?

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में शामिल होने के लिए उड़ीसा के पुरी में आते हैं। लेकिन कई लोगों का मानना होता है कि, भगवान जगन्नाथ की लकड़ी से बनी मूर्ति हर साल नई बनाई जाती है, लेकिन इसके पीछे की सच्चाई आपकी सोच से भी परे और रोचक है।

    नई मूर्ति बनाने की पवित्र प्रक्रिया को नवकलेवर कहा जाता है, जो एक दुर्लभ ज्योतिषीय संयोग के तहत पूरी होती है। हिंदू धर्म के सबसे रहस्यमय और आध्यात्मिक रूप से खास अनुष्ठानों में से एक, जिसके बारे में अधिकतर भक्त नहीं जानते हैं।

    कई लोगों को मानना है कि, रथ यात्रा से पहले भगवान जगन्नाथ की नई मूर्ति हर साल निर्मित की जाती है। हालांकि यह सच नहीं है। मंदिर की परंपराओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की मूर्तियों को सिर्फ पवित्र नवकलेवर समारोह के दौरान ही बदला जाता है। यह दुर्लभ घटना हर साल नहीं होती है, बल्कि सिर्फ हिंदू चंद्र पंचांग में एक खास संयोग बनने पर ही होती है।

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    पवित्र लकड़ियों को कैसे चुना जाता है?

    भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और बहन सुभद्रा की नई मूर्ति बनाने से पहले नीम के पेड़ों को अच्छा से तराशा जाता है, जिसे दारू ब्रह्मा कहते हैं। इन नीम के पेड़ों का चयन यूं ही नहीं होता, बल्कि मंदिर के पुजारी और पारंपरिक बनजगा दल ऐसे पेड़ों को खोजते हैं, जो प्राचीन ग्रंथों दर्ज कई शास्त्रसूचक चिह्नों से मेल खाते हों।

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    मूर्ति के लिए पेड़ की चयन प्रक्रिया एक दिव्य तीर्थयात्र से कम नहीं होती है, जिसमें नक्काशी शुरू होने से पहले अनुष्ठान, प्रार्थानाएं और दिव्य प्रतीकवाद का पालन किया जाता है।

    कुछ खास कारीगर ही मूर्ति बनाते हैं।

    नीम के पेड़ से नई मूर्ति बनाने की जिम्मेदारी महाराणा परिवार को दी जाती है, जिसके सदस्य पीढ़ियों से जगन्नाथ प्रभु की सेवा करते आ रहे हैं।

    यह काम मंदिर परिसर के अंदर एक खास सुरक्षित क्षेत्र में किया जाता है। किसी भी बाहरी व्यक्ति को मूर्ति निर्माण की प्रक्रिया देखने की अनुमति नहीं होती है। हर चरण में सदियों पुरानी परंपराओं का सम्मानजनक रूप से पालन किया जाता है।

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    ब्रह्म परिवर्तन का रहस्य क्या है?

    नवकलेवर का सबसे पवित्र हिस्सा ब्रह्म परिवर्तन है, जो पूरी तरह गुप्त तरीके से संपन्न किया जाता है। इस समारोह के दौरान रहस्यमय ब्रह्म पदार्थ को पुराने प्रतिमाओं से नई प्रतिमाओं में विधिपूर्वक स्थानांतरित किया जाता है। सिर्फ मंदिर के कुछ चुनें हुए पुजारी ही इस अनुष्ठान में भाग लेते हैं और मंदिर परंपरा के अनुसार इसे काफी गोपनीय रखा जाता है।

    ब्रह्मा परिवर्तन के बाद पुरानी लकड़ी के मूर्तियों को फेंकने के बजाय उन्हें जगन्नाथ मंदिर परिसर के पवित्र स्थान कोइली बैकुंठ में काफी श्रद्धापूर्वक विदा किया जाता है। भक्तों का मानना है कि, यह नवजीवन दिव्य चक्र का प्रतीक है, जिसमें भगवान शाश्वत आध्यात्मिक सार को बनाए रखने के लिए नया भौतिक रूप धारण करते हैं।

    नवकलेवर की परंपरा

    2026 में नवकलेवर की परंपरा क्यों नहीं निभाई जाएगी?

    नवकलेवर का उत्सव तभी मनाया जाता है, जब हिंदू पंचांगों में अधिक आषाढ़ माह शामिल हो। अधिक आषाढ़ एक अतिरिक्त चंद्र माह होता है, जो अनियमित अंतराल पर 12 से 19 सालों के अंतराल पर होता है। चूंकि 2026 में अधिक आषाढ़ माह शामिल नहीं है, इसलिए नवकलेवर के लिए आवश्यक पवित्र शर्तें पूरी नहीं होती हैं। इसलिए इस साल कोई नई मूर्ति नहीं बनाई जाएगी।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।