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    बिना कील के तैयार होते हैं भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के 3 विशाल रथ, पढ़ें इनकी खासियतें

    Updated: Fri, 17 Jul 2026 11:35 AM (IST)

    ओडिशा के पुरी में हर साल होने वाली भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई से शुरू होकर 24 जुलाई को समाप्त होगी। इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी ...और पढ़ें

    भगवान जगन्नाथ के रथों का अद्भुत रहस्य (Picture Credit: AI Generated)

    भगवान जगन्नाथ के रथों का अद्भुत रहस्य (Picture Credit: AI Generated)  

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। ओडिशा के पुरी में हर साल भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा के उत्सव को बेहद उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस भव्य रथ यात्रा में श्रद्धालु शामिल होने के लिए दूर-दूर से आते हैं।


    वैदिक पंचांग के अनुसार, इस बार भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत 16 जुलाई से हुई है। वहीं, इसका समापन 24 जुलाई को होगा। इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा अलग-अलग रथ पर विराजमान होते हैं, जिनके दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिलती है।

    विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा की शुरुआत ओडिशा के पुरी में श्री जगन्नाथ मंदिर से होती है। यात्रा के दौरान प्रभु गुंडिचा मंदिर जाते हैं। रथ यात्रा में शामिल होने वाले रथ बेहद खास होते हैं। आइए इस आर्टिकल में आपको भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के रथ का महत्व और खासियत के बारे में बताते हैं।

    Lord Balabhadra

    (Picture Credit: AI Generated)  

    भगवान जगन्नाथ का रथ

    भगवान जगन्नाथ के रथ को नंदीघोष कहा जाता है। इस रथ की ऊंचाई 45 फीट होती है। इस रथ की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि रथ को बनाने के लिए किसी भी कील का प्रयोग नहीं किया जाता है। प्रभु के रथ को नीम के पेड़ की लकड़ी से बनाया जाता है। यह रथ भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के रथ से बड़ा होता है। इस रथ में 16 पहिए होते हैं, जिनका रंग लाल और पीला होता है। साथ ही रथ को लाल और पीले कपड़ों से सुंदर तरीके से सजाया जाता है।
    प्रभु के इस रथ में शंख, बलाहक, श्वेत, हरिदश्व नाम के घोड़े लगे रहते हैं। भगवान जगन्नाथ के रथ में सबसे ऊपर सुदर्शन चक्र और गरुड़ विराजमान होते हैं। सुदर्शन चक्र को नीला चक्र भी कहा जाता है। यह भक्तों की रक्षा का प्रतीक माना जाता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भगवान जगन्नाथ के रथ को हांकने वाले सारथी का नाम दारुक है। रथ को खींचने वाली रस्सी को शंखचूड़ कहा जाता है। रथ के ऊपर लगे ध्वज को त्रैलोक्यमोहिनी कहा जाता है। यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ सबसे पीछे चलता है।

    Lord Balabhadra

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    भगवान बलभद्र का रथ

    भगवान बलभद्र के रथ को तालध्वज कहा जाता है। इस रथ में 14 पहिए लगे होते हैं। यह रथ 44 फीट ऊंचा होता है। भगवान बलभद्र के रथ को लाल और हरे रंग के कपड़ों से सजाया जाता है। साथ ही मंडप को बनाने के लिए इन्हीं रंगों के कपड़ों का प्रयोग किया जाता है। प्रभु के इस रथ के सारथी को मातलि कहा जाता है। भगवान बलभद्र के रथ में आगे लकड़ी के चार काले रंग के घोड़े लगाए जाते हैं, जिनका नाम तीव्र, घोर, दीर्घशर्मा और स्वर्णनाभ है।
    जिस रस्सी से रथ को खींचा जाता है, उसे वासुकी नाग कहा जाता है। रथ के ऊपर झंडा लहराता है, उसे उन्नानी नाम से जाना जाता है। रथ में भगवान बलभद्र के अस्त्र हल और मूसल होते हैं।

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     (Picture Credit: AI Generated)  

    देवी सुभद्रा का रथ

    देवी सुभद्रा के रथ को दर्पदलन कहा जाता है। इस भव्य रथ को लाल और काले रंग के कपड़ों से सजाया जाता है। देवी सुभद्रा के रथ में आगे 4 घोड़ियां लगाई जाती हैं, जिनका रंग लाल होता है। लाल रंग स्त्री शक्ति का प्रतीक है। इस रथ में कुल 12 पहिए होते हैं। रथ के सारथी देवी सुभद्रा के पति अर्जुन होते हैं। यह रथ 43 फीट ऊंचा होता है। रथ के ऊपर लगे ध्वज को नादम्बिका नाम से जाना जाता है। देवी सुभद्रा का रथ भगवान जगन्नाथ और बलभद्र के रथों के बीच में चलता है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।