क्या है भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रथ का नाम? जानिए रथ यात्रा से जुड़ी हर खास जानकारी
पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा, जिसमें इसके प्राचीन इतिहास और रथों व उनके घोड़ों के पीछे के प्रतीकात्मक अर्थों पर प्रकाश डाला गया है। रथ यात्रा के दौरान भग ...और पढ़ें

जगन्नाथ रथ यात्रा में घोड़ों का आध्यात्मिक महत्व और उनके नाम

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जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। उड़ीसा के पुरी में भगवान जगन्नाथ उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की भव्य रथ यात्रा का आगाज हो चुका है। भक्तों की भारी भीड़ अपने जगत के नाथ का रथ बड़ी ही श्रद्धा के साथ खींच कर उन्हें पुरी में भ्रमण कराने का पुण्य कमा रही है।
लेकिन क्या आपको रथ यात्रा के बारे वो बातें पता हैं, जो शायद देखने में तो सामान्य लगे लेकिन उसके पीछे का प्रतीकात्मक अर्थ आपको भी सोचने पर मजबूर कर देगा। आइए जानते हैं प्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा से जुड़ी वो अनोखी बातें जो आपको पता होनी चाहिए।
रथ यात्रा उत्सव की उत्पत्ति
स्कंद पुराण और ब्रह्म पुराण के अनुसार, जगन्नाथ रथ यात्रा का महोत्सव का इतिहास हजारों साल पुराना है। चार धाम तीर्थ स्थलों में से एक पुरी सदियों से इस वार्षिक उत्सव का लुफ्त उठाता आ रहा है।
रथ यात्रा का मतलब रथयात्रा है, जिसमें भगवान अपने मंदिर के गर्भगृह से बाहर निकलकर रथ पर विराजमान होकर सभी भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। उनके आशीर्वाद का पात्र हर कोई है।
भगवान के रथों के नाम
जगन्नाथ स्वामी के रथ का नाम (नंदीघोष) जिसमें 16 पहिये लगे होते हैं और इसकी ऊंचाई करीब 45 फीट होती है।
बलभद्र भगवान के रथ का नाम (तालध्वज) होता है, जिसमें 14 पहिये लगे होते हैं।
बहन सुभद्रा के रथ का नाम (दर्पदलन) जो तीनों रथों में सबसे छोटा होता है, जिसमें 12 पहिये होते हैं।
हर साल रथ यात्रा के निर्माण का काम अक्षय तृतीया से शुरू हो जाता है, जिसे बनाने के लिए नीम की लकड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि, इसमें किसी भी तरह की कील का इस्तेमाल नहीं किया जाता है।
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हर वर्ष जगन्नाथ मंदिर से यात्रा शुरू होकर गुंडिचा मंदिर तक पहुंचती है और फिर वापस जगन्नाथ मंदिर आ जाती है, जो कुल 9 दिनों तक यात्रा चलती है।
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भगवान जगन्नाथ के रथ के घोड़े के नाम
भगवान जगन्नाथ के रथ नंदीघोष को 4 घोड़ों द्वारा खींचा जाता है। इन घोड़ों के नाम-
- शंख
- बलाहक
- श्वेत
- हरिदाश्व
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, ये घोड़े अत्यंत पवित्र, बलशाली, ज्ञान और दिव्य ऊर्जा के प्रतीक माने जाते हैं। जिसमें सफेद रंग को सत्य, शांति औऱ आध्यात्मिक प्रकाश से जोड़ा जाता है।
भगवान बलभद्र के रथ के घोड़े
भगवान बलभद्र के रथ तालध्वज को चार काले घोड़े मिलकर खींचते हैं, जिनके नाम हैं-
- तीव्र
- घोर
- दीर्घश्रमा
- स्वर्णनाभ
हिंदू धर्म में इन घोड़ों को ऊर्जा, साहस और सफलता का प्रतीक माना जाता है। इन घोड़ों के नाम सकारात्मकता, सफलता और आत्मविश्वास को दर्शाते हैं।
देवी सुभद्रा के रथ का नाम
वही बात की जाए देवी सुभद्रा की तो उन्हें नारी शक्ति का स्वरूप माना जाता है, इसलिए उनके रथ से जुड़े घोड़े भी स्त्री का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए उनके रथ पर घोड़े की जगह घोड़ी जुड़ी होती है, जिसका नाम रोचिका, मोचिका और जीता है। यह तीनों ही घोड़ी जीत, कभी न हार मानने वाली शक्ति का प्रतीक है।
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भगवान के घोड़ों के नाम अलग क्यों रखें जाते हैं?
धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक, रथों के घोड़ों के नाम सिर्फ पहचान मात्र नहीं हैं, बल्कि वे देवताओं के गुणों और उनके दिव्य स्वरूप का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। रथ यात्रा के दौरान इन घोड़ों की भी खास पूजा की जाती है और फिर इन्हें रथ में जोड़ा जाता है।
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